भरतपुर-धौलपुर समाचार: खेतों में नैनो क्रांति! इफको ने फूटा का नगला में फूंका आधुनिक खेती का शंखनाद, किसानों को मिले खुशहाली के नए मंत्र
भरतपुर और धौलपुर के ग्राम फूटा का नगला में इफको द्वारा आयोजित भव्य किसान गोष्ठी में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसी आधुनिक तकनीकों से खेती की लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने के गुर सिखाए गए। डिप्टी फील्ड मैनेजर श्याम सुंदर और विशेषज्ञों की उपस्थिति में 90 किसानों ने ड्रोन छिड़काव और संकट हरण बीमा योजना की जानकारी प्राप्त की। जानिए कैसे नैनो क्रांति बदल रही है राजस्थान के किसानों की तकदीर।

धौलपुर/भरतपुर। आधुनिक कृषि तकनीकों के संगम और किसानों की आय दोगुनी करने के संकल्प के साथ ग्राम फूटा का नगला में खेती के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है। भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (इफको) द्वारा आयोजित विशाल किसान गोष्ठी ने न केवल क्षेत्र के कृषकों को जागरूक किया, बल्कि उन्नत उर्वरकों के जरिए कृषि लागत कम करने का मार्ग भी प्रशस्त किया। धौलपुर के इस सुदूर अंचल में उमड़ी किसानों की भारी भीड़ इस बात का प्रमाण रही कि अब पारंपरिक खेती का स्थान वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले रहा है।
कार्यक्रम का आगाज इफको के डिप्टी फील्ड मैनेजर श्याम सुंदर (भरतपुर) की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ, जिन्होंने गोष्ठी की कमान संभालते हुए किसानों को भविष्य की खेती से रूबरू कराया। इफको एमसी से आए विशेषज्ञ ओमप्रकाश चौधरी एवं कृष्णन कुमार ने तकनीकी बारीकियों पर प्रकाश डाला, जबकि पूरे कार्यक्रम का सफल संचालन एमडी राहुल सिंह परिहार के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। इस महत्वपूर्ण आयोजन को धरातल पर उतारने में भोला फेड प्रोड्यूसर कंपनी, शहरोली के धीरज दीक्षित का विशेष नेतृत्व रहा, जिनके आह्वान पर लगभग 90 प्रगतिशील किसानों ने पूरी सक्रियता के साथ इस संगोष्ठी में अपनी सहभागिता दर्ज कराई।
गोष्ठी के मुख्य वक्ता श्याम सुंदर ने नैनो डीएपी, नैनो यूरिया, सागरिका, नैनो जिंक, नैनो कॉपर एवं कंसोर्टिया जैसे अत्याधुनिक उत्पादों की कार्यक्षमता पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने बीज उपचार की महत्ता पर जोर देते हुए स्पष्ट किया कि गेहूं, सरसों और बाजरा जैसी फसलों में नैनो डीएपी का बीज उपचार एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। किसानों को सलाह दी गई कि गेहूं की बुवाई से पूर्व 100 किलोग्राम बीज में नैनो डीएपी की एक पूरी बोतल का मिश्रण कर उसे 30 मिनट तक छांव में सुखाएं, जिससे फसल की नींव मजबूत हो सके। सिंचाई प्रबंधन पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि गेहूं की फसल में पहले पानी के साथ दानेदार यूरिया का प्रयोग करना उचित है, किंतु 35 से 40 दिन की फसल होने पर दानेदार यूरिया के बजाय नैनो यूरिया, नैनो डीएपी और सागरिका का संतुलित स्प्रे करना चाहिए।
इस वैज्ञानिक पद्धति के लाभ केवल पैदावार तक सीमित नहीं हैं। विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि इन उत्पादों के उपयोग से वायु, जल और मृदा प्रदूषण में भारी कमी आती है। साथ ही, फसलों के तने मजबूत होने से वे गिरने से बचती हैं, उत्पाद की गुणवत्ता में निखार आता है और जड़ों के विस्तार में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नैनो उत्पादों के प्रयोग से पारंपरिक भारी-भरकम खाद की बोरियों पर निर्भरता कम होती है, जिससे न केवल किसानों की जेब पर बोझ कम होता है बल्कि खेती अधिक किफायती और प्रभावी बन जाती है।
तकनीक और सुरक्षा के दोहरे संगम के रूप में, गोष्ठी में ड्रोन तकनीक द्वारा नैनो यूरिया के छिड़काव का सजीव वर्णन किया गया, जो समय और श्रम की बचत का बेहतरीन उदाहरण है। इसके साथ ही, किसानों के सामाजिक और आर्थिक संरक्षण हेतु इफको की 'संकट हरण बीमा योजना' के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी साझा की गई। कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित किसानों ने कृषि क्षेत्र में आए इन क्रांतिकारी बदलावों की सराहना की और आधुनिक तकनीकों को अपने खेतों में उतारने का दृढ़ संकल्प लिया। यह आयोजन केवल एक गोष्ठी मात्र नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हुआ है।

Pratahkal Bureau
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