आयुर्वेदिक खेती से वैर और भुसावर के किसानों को मिला स्वरोजगार
भुसावर में पारंपरिक बागवानी के साथ चंदन, केसर और अश्वगंधा जैसी औषधीय फसलों से किसान आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

भुसावर के दीवान वाले बाग में स्थित सैकड़ों वर्ष पुराना ऐतिहासिक हर्ड का पेड़, जिसका उपयोग त्रिफला चूर्ण और अन्य आयुर्वेदिक औषधियां बनाने में किया जाता है।
भुसावर कस्बा, वैर व कस्बा भुसावर बागान के लिये ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि औषधीय खेती के लिये भी प्रसिद्ध है। वैर भुसावर में आम, अनार, नीबू, बैर, आंवला, अमरूद के बागान तो लगाये जाते रहे हैं, लेकिन यहां की जलवायु में अब चंदन के बागान व औषधीय खेती के रूप में केसर, सताबर, सफेद मूसली, हर्ड, बहेडा, अश्वगंधा, ग्वारपाठा, एलोबेरा, सुरदर्शन की खेती भी जैविक रूप में अत्याधुनिक कृषि संसाधनों को अपना कर की जा रही है।
अजब की खेती, गजब का लाभ: किसान हो रहे मालामाल
आस पास के गांवों में अजब की खेती गजब का लाभ वाली जैविक खेती पर आधारित औषधीय खेती किसानों की ओर से बढ़-चढ़ कर की जा रही है। यहाँ पर किसानों की ओर से स्मार्ट खेती परंपरागत तरीके से जैविकीय रूप में की जा रही है। यहां का किसान औषधीय खेती उगा कर मालामाल हो रहा है और किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो रहा है। औषधीय खेती के पेड़ धन उगलने में लगे हुए हैं।
औषधीय खेती में निम्न फसलों की खेती एक किसान द्वारा दूसरे किसान से प्रेरणा लेकर निरंतर की जा रही है:
- सतावर और अश्वगंधा
- ग्वारपाठा (एलोवेरा)
- हर्ड और बहेडा
- अजवायन
शिक्षित युवाओं का स्वरोजगार: नौकरी के बजाय आत्मनिर्भरता
बेरोजगार युवा वर्ग जिसको सरकारी नौकरी पढ़ाई करने के बाद नहीं मिली है, वे स्वयं आत्म निर्भर हो कर रोजगार परक खेती करने में लगे हुए हैं। यहाँ कस्बा के शिक्षित लोगों ने बताया कि:
"जब एम ए, बी एड या कृषि स्नातक योग्यता पाने के बाद भी सरकारी नौकरी नहीं लग पाई, तो अपने ही हिस्सेदारी के खेत में कम भूमि में अधिक उत्पादन देने वाली औषधीय खेती कर आत्म निर्भर होकर अपनी जीविका चला रहे हैं।"
औषधीय खेती करने वाले किसानों ने बताया कि वे अश्वगंधा, सतावर, गौखरू, अनार, केसर एवं मसाले वाली खेती यथा अजबाईन, मैथी, सौंफ की खेती करके काफी मुनाफा कमा रहे हैं।
क्षेत्र की शान: सैकड़ों वर्ष पुराना हर्ड का ऐतिहासिक पेड़
यहाँ नाथू का नंगला रोड स्थित दीवान वाले बाग में सैकड़ों वर्ष पुराना आयुर्वेदिक औषधि हर्ड का पेड़ है और ऐसा जान पड़ता है की ऐसा पेड़ राजस्थान में कहीं और नहीं है। कस्बा वासियों ने बताया कि:
"इस पेड़ में 12 महीने हर्ड आती रहती हैं। इस हर्ड, बहेडा, आंवला का उपयोग दबाईयों के रूप में किया जाता रहा है।"
त्रिफला का चूर्ण पेट की समस्त बीमारियों के लिये औषधि के रूप में किया जाता है। यहाँ पैदा होने वाले फल आंवला, हर्ड, बहेडा, सतावर, नीबू, नीम, गिलोय आदि फलों को दवाई के लिये आयुर्वेदिक की रसायन शाला में ले जा कर औषधीय दवाई बनाई जाती रहती है, यह पेड़ कस्बे की शान है।
आयुर्वेद का बढ़ता महत्व और विशेषज्ञ की राय
सतावर, अश्वगंधा, पीपल, सफेद मूसली आदि का उत्पादन भी किसान बड़े पैमाने पर करने में लगे हुए हैं। यहाँ उगाई जा रही औषधीय खेती से पैदा होने वाले फलों को दवाईयों के रूप में जयपुर और भरतपुर के लोग ले जाकर अपना काम चलाते हैं।
आयुर्वेदिक औषधालय में तैनात वैद्य ने बताया कि:
"भुसावर इलाके में किसानों द्वारा आयुर्वेदिक खेती की जा रही है। आयुर्वेद के द्वारा लोगों को अधिक से अधिक फायदा मिले, इसके लिये आयुर्वेदिक औषधियों के उपयोग व उत्पादन के लिये तीन साल से जनता को प्रेरित कर रहा हूं।"
कोरोना काल में आयुर्वेदिक औषधियां का प्रयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में किया जा रहा है, जिसमें आयुर्वेदिक दवा सबसे अग्रणी है। भुसावर इलाके में हर्ड, बहेडा, बिजोडा, सफेद मूसली, एलोबेरा, टेसूला, मरुआ, सुर्दर्शन, नीम, गिलोय आदि औषधियों की खेती पर बल दिया जा रहा है और किसान ऐसी आयुर्वेद औषधि के फसल उगाने में लग गए हैं।

Pratahkal Bureau
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