भूसावर। राजस्थान के भरतपुर जिले में रियासत कालीन समय में बने किले, बावड़ियाँ और पक्के तालाब अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाने जाते हैं। लेकिन वर्तमान में इनकी हालत खस्ताहाल हो चुकी है। भूसावर उपखंड के गांव अलीपुर समेत अन्य क्षेत्रों में किले और बावड़ियाँ देखरेख के अभाव में जर्जर हो चुकी हैं।

इतिहासकारों के अनुसार, रियासत काल में राजा-महाराजाओं और रजवाड़ों के समय इन किलों और बावड़ियों का निर्माण न केवल सुरक्षा और जल संरक्षण के लिए किया गया था, बल्कि इनकी वास्तुकला कलात्मक झरोखों और दो मंजिला हवालों से सुसज्जित थी। बावड़ियों में वर्षा के जल को संग्रहित कर पशुओं के पीने और खेती की सिंचाई में उपयोग किया जाता था। पक्की नालियों के माध्यम से सिंचाई की व्यवस्था प्रभावी ढंग से की जाती थी।

वर्तमान समय में सरकारी देखरेख के अभाव और अतिक्रमण के चलते ये बावड़ियाँ और तालाब जर्जर हो चुके हैं। कुछ स्थानों पर गंदगी, मिट्टी और कूड़ा-कर्कट जमा हो गया है, जबकि अन्य जगहों पर बावड़ी की दीवारों पर गोबर के कंडे रखे जा रहे हैं। अलीपुर की बावड़ी जैसी संरचनाएँ अब खंडर के रूप में नजर आती हैं और आसपास की जमीन भी समतल हो चुकी है।

स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत की ओर से भी इन ऐतिहासिक धरोहरों की देखरेख नहीं की जा रही है। पर्यटन और पुरातत्व विभाग ने जिले के बल्लभगढ़, हाथोड़ी, निठार और अलीपुर क्षेत्रों की बावड़ियों और किलों की मरम्मत या संरक्षण की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार तत्काल कदम नहीं उठाती है तो ये ऐतिहासिक स्थल पूर्णत: नष्ट हो सकते हैं।

विशेषज्ञों और स्थानीय निवासियों की मांग है कि रियासत कालीन किले, बावड़ियाँ, पक्के तालाब और हवेलियाँ पर्यटन के नक्शे में शामिल कर उनकी मरम्मत और संरक्षण सुनिश्चित किया जाए। इससे न केवल ये ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित रहेंगी, बल्कि स्थानीय पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूती मिलेगी।

Pratahkal Bureau

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