विद्या भारती प्रशिक्षण वर्ग: बालक के समग्र विकास का आधार बने शिक्षा
संगठन मंत्री गोविंद कुमार ने चित्तौड़ प्रांत के प्रशिक्षण वर्ग में शिक्षा को पुस्तकीय ज्ञान के बजाय जीवनोपयोगी बनाने और सर्वांगीण विकास पर जोर दिया।

विद्या निकेतन मंदारेश्वर में आयोजित प्रशिक्षण वर्ग के दौरान वंदना सत्र में उपस्थित प्रतिभागी और प्रबोधन देते संगठन मंत्री गोविंद कुमार।
विद्या भारती चित्तौड़ प्रांत द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण वर्ग के वंदना एवं प्रबोधन सत्र में विद्या भारती राजस्थान क्षेत्र के संगठन मंत्री गोविंद कुमार ने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि वह जीवनोपयोगी बनकर बालक के समग्र विकास का आधार बने। उन्होंने कहा कि विद्या भारती का मुख्य उद्देश्य बालक का होलिस्टिक डेवलपमेंट अर्थात समग्र विकास है, जिसमें परिवार, पाठशाला और समाज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
कार्यक्रम विद्या निकेतन मंदारेश्वर में आयोजित ग्रीष्मकालीन शारीरिक, योग, संगीत, संस्कृत, नैतिक-आध्यात्मिक, शिशु वाटिका, वैदिक गणित एवं खेल प्रशिक्षण वर्ग के अंतर्गत संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. खुशपाल सिंह राठौर रहे, जबकि अध्यक्षता रमेशचंद्र बृजवासी ने की। कार्यक्रम में नवनीत शुक्ला एवं ललित दवे की विशेष उपस्थिति रही। अतिथियों का परिचय प्रांत प्रशिक्षण संयोजक महेंद्र सिंह सिसोदिया ने कराया, जबकि तिलक एवं उपरणा से स्वागत दुर्गालाल जांगीड़ तथा रामप्रसाद लोधा ने किया।
अपने प्रबोधन में गोविंद कुमार ने कहा कि 10 वर्ष की आयु तक बालक का लगभग 90 प्रतिशत मस्तिष्क विकसित हो जाता है और वह बहुत कुछ समझने लगता है। उन्होंने कहा कि भारतीय विज्ञान और वेदों में समग्र विकास की अवधारणाएं पहले से समाहित हैं। अभिमन्यु द्वारा गर्भ में चक्रव्यूह भेदन सीखने का उल्लेख केवल कल्पना नहीं, बल्कि सत्य है। उन्होंने कहा कि कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेंद्रियों के विकास में आधारभूत विषयों की महती भूमिका रहती है।
उन्होंने कहा कि शारीरिक शिक्षा, योग, संगीत, संस्कृत एवं नैतिक-आध्यात्मिक शिक्षा के साथ वैदिक गणित, खेल और शिशु वाटिका की क्रियात्मक एवं गतिविधि आधारित शिक्षण पद्धति बालक के समग्र विकास की संकल्पना को साकार करती है। शिशु कक्षाओं में स्वर्णप्राशन को गुणकारी, आरोग्यता प्रदान करने वाली एवं बलवर्धक औषधि बताते हुए उन्होंने कहा कि इसे निर्धारित समय और नक्षत्र में कराया जाना चाहिए।
गोविंद कुमार ने कहा कि बालक का आहार, प्राण शक्ति और योगिक क्रियाएं, जो समाधि तक ले जाने की प्रक्रिया हैं, जीवन निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संस्कृत सकारात्मक एवं वैज्ञानिक सोच प्रदान करती है, जबकि संगीत मन को एकाग्र करता है। उन्होंने कहा कि नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा जीवन का अत्यंत उपयोगी पक्ष है, जो जीवन मूल्यों की शिक्षा देती है।
उन्होंने कहा कि एआई का युग आ चुका है, लेकिन जो कार्य मनुष्य कर सकता है, वह एआई नहीं कर सकती। बालक के समग्र विकास की संकल्पना को साकार करने के लिए आचार्यों की आवश्यकता सदैव बनी रहेगी। संवेदनशीलता, परोपकार और राष्ट्रभक्ति की भावनाओं को बालकों में जागृत करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक में चरित्र निर्माण का भाव होना चाहिए तथा बालक की सोच को समझना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के अंत में वर्ग के बौद्धिक प्रमुख केसरीमल पंड्या के नेतृत्व में सामूहिक वंदेमातरम् एवं राष्ट्रगीत गायन के साथ सत्र का समापन हुआ।

Pratahkal Bureau
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