राजस्थान के बारा शहर स्थित सुप्रसिद्ध 'खाकी बाबा की बगीची' इन दिनों अध्यात्म और श्रद्धा के अद्भुत संगम की साक्षी बनी हुई है। आगामी 2 जनवरी 2026 तक चलने वाले नौ दिवसीय 'श्री राम कथा ज्ञान गंगा यज्ञ' के अंतर्गत गुरुवार को भक्ति का ऐसा सैलाब उमड़ा कि संपूर्ण क्षेत्र राममय हो गया। कथा के नवम दिवस पर वातावरण उस समय अत्यंत भावुक हो उठा जब सुश्री शिवानी अवस्थी ने अपनी ओजस्वी और मधुर वाणी से मां शबरी के प्रतीक्षा और श्रीराम से मिलन के मार्मिक प्रसंग का वर्णन किया। शबरी की अटूट श्रद्धा और भगवान के प्रति उनके निश्छल प्रेम को सुनकर वहां उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो गया और श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर होकर झूमने-नाचते नजर आए।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य यजमान एवं पूर्व जिला प्रमुख नंदलाल सुमन द्वारा व्यास पीठ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ हुआ। इसके पश्चात चित्रकूट से पधारे पूज्य श्रीराम सुखदास महाराज ने अपनी अमृतवाणी से ज्ञान गंगा को प्रवाहित करते हुए रामायण के उन गौरवशाली प्रसंगों को जीवंत कर दिया, जो मानव जीवन के लिए आदर्श हैं। महाराज श्री ने राम-सुग्रीव मित्रता के निष्काम प्रेम से लेकर अंगद संवाद की चतुराई, मेघनाद और कुंभकरण वध के शौर्य, तथा राम-रावण युद्ध के धर्म-अधर्म के संघर्ष का अत्यंत रोचक वर्णन किया। जब कथा व्यास ने भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी और उनके भव्य राज्याभिषेक का प्रसंग सुनाया, तो पंडाल 'जय श्री राम' के उद्घोष से गूंज उठा। महाराज श्री ने श्रोताओं को भगवान राम के मर्यादित, संयमित और पुरुषोत्तम स्वरूप को आत्मसात करने की प्रेरणा दी।

कथा के समापन सत्र में एक उच्च नैतिक संदेश देते हुए सभी श्रद्धालुओं को अपने जीवन में धर्मानुसार आचरण करने, लुप्त होते पारिवारिक संस्कारों को पुनः जीवित करने और समाज में आपसी सद्भाव बनाए रखने का दृढ़ संकल्प दिलाया गया। रामकथा सत्संग समिति के सदस्य सीताराम शर्मा ने बताया कि इस आयोजन में शहर के गणमान्य नागरिकों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर पुण्य लाभ कमाया। कार्यक्रम के अंत में व्यास पीठ की भव्य आरती उतारी गई और योगेश पैंतरा द्वारा सभी भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया।

इस गरिमामय आयोजन को सफल बनाने में रामकथा सत्संग समिति के अध्यक्ष व पूर्व जिला प्रमुख नंदलाल सुमन, मंत्री व पूर्व तहसीलदार लक्ष्मीनारायण प्रजापति, कोषाध्यक्ष शंभूदयाल गोयल, संरक्षक सीताराम शर्मा, सदस्य खेमराज, पंडित ओम गौतम, घनश्याम सुमन और लक्ष्मीकांत का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। आयोजन के दौरान हरनावदाशाजी से पधारे हुकमचंद सोनी व लडडू सोनी तथा छीपाबडौद से आए दामोदार सोनी व हेमराज सोनी सहित अन्य श्रद्धालुओं ने आचार्यों का भव्य स्वागत किया। यह धार्मिक अनुष्ठान न केवल आस्था का प्रतीक बना, बल्कि इसने बारा के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को भक्ति के सूत्र में पिरोने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

Pratahkal Newsroom

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