शाहबाद घाटी में ग्रीनको एनर्जी प्रोजेक्ट और पेड़ कटाई का विरोध
बारां में प्रस्तावित निजी बिजली परियोजना के लिए लाखों पेड़ों की कटाई को पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन और विनाशकारी कदम बताया है।

बारां की शाहबाद घाटी में प्रस्तावित ग्रीनको एनर्जी प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलन करते पर्यावरण कार्यकर्ता प्रशांत पाटनी, बृजेश विजयवर्गीय और स्थानीय निवासी।
बारां। जिला बारां की जैव-विविधता से भरपूर शाहबाद घाटी में ग्रीनको एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद द्वारा प्रस्तावित निजी बिजली परियोजना के नाम पर लाखों पेड़ों की कटाई की अनुमति देना न केवल पर्यावरण-विरोधी है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार और भावी पीढ़ियों के भविष्य पर सीधा हमला है। राजेंद्र शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार, समिति के संरक्षक और पर्यावरण कार्यकर्ता प्रशांत पाटनी ने कहा कि शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति, बारां के तत्वावधान में चल रहे “शाहबाद जंगल बचाओ आंदोलन” के अंतर्गत हम इस सरकारी कॉरपोरेट सांठगांठ की कड़ी निंदा करते हैं।
हरित ऊर्जा के नाम पर पर्यावरणीय पाखंड
प्रशांत पाटनी ने स्पष्ट किया कि "तथाकथित ‘हरित ऊर्जा’ की आड़ में जंगल उजाड़ने का लाइसेंस देना पर्यावरणीय पाखंड है। जंगल काटकर हरित विकास का दावा करना सफेद झूठ है।" चंबल संसद के संयोजक और शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति बारां के अन्य संरक्षक बृजेश विजयवर्गीय ने कहा कि शाहबाद की घाटी केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि यह पानी, मिट्टी, वन्यजीव और स्थानीय आजीविका की जीवनरेखा है। सरकार यदि कॉरपोरेट दबाव में आकर जंगलों को बलि का बकरा बना रही है, तो यह जनविरोधी और राष्ट्रविरोधी निर्णय है। हम इस विनाश को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।
प्रक्रियाओं की अनदेखी और कानूनी अपराध
आंदोलनकारियों ने आगे कहा कि पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (ईआईए) की प्रक्रियाएं खोखली औपचारिकताएं बन चुकी हैं। स्थानीय ग्राम सभाओं की सहमति, वन्यजीव गलियारों, जलस्रोतों और आदिवासी/स्थानीय समुदायों के अधिकारों को सुनियोजित ढंग से नजरअंदाज किया जा रहा है। यह कानूनी और नैतिक दोनों स्तरों पर अपराध है।
निरस्त हो वन-कटाई की अनुमति
प्रशांत पाटनी ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार से मांग की कि शाहबाद घाटी में प्रस्तावित परियोजना हेतु दी गई सभी वन-कटाई अनुमतियाँ तत्काल निरस्त की जाएँ। स्वतंत्र, पारदर्शी और वैज्ञानिक पुनः ईआईए कराई जाए, जिसमें स्थानीय समुदायों की वास्तविक सहमति हो। वैकल्पिक स्थानों पर परियोजना पर विचार किया जाए, जंगल नहीं, समाधान खोजे जाएँ। पर्यावरणीय क्षति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कंपनी पर कड़ी जवाबदेही तय हो।
राज्यव्यापी जनांदोलन की चेतावनी
दोनों पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ताओं ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार और कंपनी ने शाहबाद के जंगलों पर यह हमला नहीं रोका, तो आंदोलन को राज्यव्यापी जनांदोलन में बदला जाएगा। कानूनी, सामाजिक और लोकतांत्रिक हर मंच पर आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।

Rajendra Sharma, Baran
नाम: राजेंद्र शर्मा
वर्तमान पद: संवाददाता | प्रांतीय प्रचार प्रमुख (भारत तिब्बत सहयोग मंच)
कार्यक्षेत्र: बारां (राजस्थान)
बीट (मुख्य विषय): राजनीतिक, आपराधिक, समसामयिक, सामाजिक, धार्मिक, पर्यटक स्थल एवं ऐतिहासिक धरोहर
परिचय
राजेंद्र शर्मा राजस्थान के बारां क्षेत्र के एक अत्यंत वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार हैं। वह वर्तमान में संवाददाता के रूप में कार्य करने के साथ-साथ 'भारत तिब्बत सहयोग मंच' में प्रांतीय प्रचार प्रमुख का दायित्व भी संभाल रहे हैं। राजेंद्र शर्मा मुख्य रूप से राजनीतिक व आपराधिक मामलों, समसामयिक और सामाजिक विषयों सहित क्षेत्र के धार्मिक, पर्यटक स्थलों तथा ऐतिहासिक धरोहरों पर विशेष रूप से रिपोर्टिंग करते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव (Work Experience)
- राजेंद्र शर्मा वर्ष 1994 से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। पिछले तीन दशकों से अधिक के अपने करियर में उन्होंने देश और राज्य के कई बड़े मीडिया संस्थानों में विभिन्न पदों पर कार्य किया है:
- राजस्थान पत्रिका (1992–1994): सहायक संवाददाता के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की।
- दैनिक भास्कर (1996/97–2000): फाउंडर ब्यूरो चीफ के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली।
- दैनिक नवज्योति (2000 से): लगभग 9 वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं।
- दैनिक जननायक: 5 वर्षों तक नियमित कार्य किया।
- अन्य राष्ट्रीय व क्षेत्रीय समाचार पत्र: उन्होंने 'राष्ट्रदूत', कोटा के साप्ताहिक समाचार पत्र 'शिल्पांगी', तथा 1 वर्ष तक 'जनसत्ता' और 'हिंदुस्तान टाइम्स' में भी कार्य किया है।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने वाणिज्य स्नातक (B.Com) की डिग्री हासिल की है।
