बारां के शाहबाद जंगल बचाओ आंदोलन को उस समय नया बल मिला, जब भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए देशभर के पर्यावरणविदों, वन विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने शाहबाद की प्रस्तावित निजी हाइड्रो पावर परियोजना को निरस्त करने तथा पूर्वी राजस्थान के अरावली क्षेत्र को कानूनी संरक्षण देने की मांग उठाई। इस मुद्दे पर बारां शहर के कोटा रोड स्थित मनिहारा तालाब के भगवान शिव मंदिर परिसर में शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति, बारां के तत्वावधान में "सामूहिक विचार-विमर्श बैठक" आयोजित की गई।

समिति दिया फाउंडेशन, वृक्ष मित्र फाउंडेशन, इंटेक बारां चैप्टर, चम्बल संसद, पंचफल बॉटनिकल गार्डन समिति, बाघ-चीता मित्र कोटा, प्रकृति संरक्षण रामगढ़ माताजी दरबार, अखिल भारतीय गायत्री साधना आश्रम कोटा, पीपुल्स फॉर एनिमल्स, पीपुल्स फॉर अरावलीज (नई दिल्ली), टीम स्वच्छ हरी-भरी सेवा नगरी चित्तौड़गढ़, ग्रीन इंडिया मूवमेंट (उत्तर प्रदेश), श्री राधे गोविन्द स्मृति सेवा समिति बारां, सेवा निवृत्त वन विभाग अधिकारी एवं कर्मचारी सोसाइटी कोटा तथा अखिल विश्व गायत्री परिवार बारां सहित देशभर के पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों के संरक्षण एवं सहयोग से संचालित है।

बैठक की अध्यक्षता अरावली विरासत जन अभियान, नई दिल्ली की सहसंस्थापक नीलम आहलुवालिया ने की। इसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए पर्यावरणविदों, वन विशेषज्ञों, आदिवासी प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने शाहबाद के जंगलों, पहाड़ियों तथा जैव विविधता के संरक्षण पर विस्तृत विचार-विमर्श किया।

बैठक में हाल ही में भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) द्वारा जारी तथ्यों पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की सितंबर 2025 की रिपोर्ट में बारां, कोटा, झालावाड़, बूंदी और सवाई माधोपुर सहित पूर्वी राजस्थान के अनेक क्षेत्रों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माना गया है। इसके बावजूद पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत हलफनामे में इन क्षेत्रों को शामिल नहीं किया गया। वक्ताओं ने कहा कि यदि एफएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्ट स्वयं शाहबाद क्षेत्र को अरावली का हिस्सा मानती है तो यहां प्रस्तावित निजी हाइड्रो पावर परियोजना को तत्काल निरस्त किया जाना चाहिए।

नीलम आहलुवालिया ने कहा कि अरावली की परिभाषा केवल 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर करना वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं है। इससे अरावली का बड़ा हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा और पूर्वी राजस्थान के जंगलों तथा जलस्रोतों पर गंभीर संकट उत्पन्न होगा।

शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति के संरक्षक बृजेश विजयवर्गीय ने कहा कि एफएसआई रिपोर्ट ने पहली बार स्पष्ट रूप से पूर्वी राजस्थान की पर्वत श्रृंखलाओं को अरावली का हिस्सा माना है। शाहबाद, अटरू, छबड़ा, छीपाबड़ौद, गंगधार, पिड़ावा, झालरापाटन, खानपुर और दरा क्षेत्र की पहाड़ियां भारत की प्राचीन प्राकृतिक धरोहर हैं। इन्हें खनन और विनाशकारी परियोजनाओं से बचाने के लिए विशेष कानूनी संरक्षण दिया जाना चाहिए।

समिति के संरक्षक प्रशांत पाटनी ने कहा कि यदि स्वयं भारत सरकार की वैज्ञानिक संस्था शाहबाद की पहाड़ियों को अरावली का भाग मान रही है तो यहां निजी हाइड्रो पावर परियोजना का औचित्य समाप्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि शाहबाद के जंगल केवल बारां ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी राजस्थान की जल सुरक्षा, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के आधार हैं।

सेवा निवृत्त वन विभाग अधिकारी एवं कर्मचारी सोसाइटी, कोटा के अध्यक्ष एवं पूर्व भारतीय वन सेवा अधिकारी जयराम पांडेय ने कहा कि एफएसआई की रिपोर्ट एक वैज्ञानिक दस्तावेज है और उसके निष्कर्षों को गंभीरता से लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी विकास परियोजना से पहले वन, वन्यजीव, जलस्रोत और स्थानीय समुदायों पर उसके प्रभाव का समग्र मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए।

इंटेक बारां चैप्टर की एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन विष्णु साबू ने कहा कि विकास तभी सार्थक है, जब वह प्रकृति और सांस्कृतिक धरोहर दोनों के संरक्षण के साथ आगे बढ़े। शाहबाद जैसे जैव-विविधता सम्पन्न क्षेत्र में पर्यावरण के अनुकूल विकास मॉडल अपनाना समय की आवश्यकता है।

बैठक के दौरान मेट्रो इंजीनियर, नई दिल्ली के इंजी. गौरवकांत गर्ग ने अपने पुत्र मंथन गर्ग के साथ भविष्य की पीढ़ियों के समक्ष स्वच्छ हवा और सुरक्षित पर्यावरण के संकट पर प्रभावी प्रस्तुति दी। उन्होंने कहा कि यदि आज जंगल और पर्वत नहीं बचाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध वायु और सुरक्षित जीवन उपलब्ध कराना असंभव हो जाएगा।

बैठक में साधना मीणा (भील आदिवासी नेत्री, उदयपुर), कुसुम रावत (आदिवासी समन्वय मंच भारत, बांसवाड़ा), सूरज सेन, चंद्रप्रकाश किर, बालूराम रेगर, अंकुर गुप्ता (अधिवक्ता, अमृतसर), रामोतार गुर्जर (एंटी माइनिंग एक्टिविस्ट, सीकर), वरदान सिंह हाड़ा, शशांक श्रोत्रिय, डॉ. मुकेश मीणा, भानु गुप्ता, मुकेश सोनी, नीता शर्मा, गब्बर यदुवंशी तथा रीना महावर सहित अनेक पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रखे।

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि एफएसआई की 2025 की रिपोर्ट के आधार पर पूर्वी राजस्थान के अरावली क्षेत्र को पूर्ण कानूनी संरक्षण दिलाने, शाहबाद की निजी हाइड्रो पावर परियोजना निरस्त कराने तथा जंगल, वन्यजीव और जलस्रोतों की रक्षा के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। साथ ही केंद्र एवं राज्य सरकार तथा सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई कि पूर्वी राजस्थान के अरावली क्षेत्रों को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर वैज्ञानिक तथ्यों के अनुरूप संरक्षण प्रदान किया जाए।

भील आदिवासी नेत्री साधना मीणा ने कहा कि दक्षिण राजस्थान के आदिवासी समाज का जीवन जल, जंगल और जमीन पर आधारित है। अरावली केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका और संस्कृति की आधारशिला है। यदि पूर्वी राजस्थान की पहाड़ियों को भी वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुरूप संरक्षण नहीं मिला तो वन, वन्यजीव और आदिवासी समुदायों का अस्तित्व गंभीर संकट में पड़ जाएगा।

आदिवासी समन्वय मंच भारत, बांसवाड़ा की युवा नेत्री कुसुम रावत ने कहा कि अरावली संरक्षण की किसी भी नीति में आदिवासी समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। जिन समुदायों ने सदियों से जंगलों की रक्षा की है, उनकी राय के बिना कोई भी निर्णय अधूरा रहेगा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति से प्रभावित क्षेत्रों में जनसुनवाई आयोजित करने की मांग की।

अधिवक्ता एवं पर्यावरण कार्यकर्ता अंकुर गुप्ता, अमृतसर ने कहा कि यदि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की वैज्ञानिक रिपोर्ट में शाहबाद और पूर्वी राजस्थान के क्षेत्र अरावली का हिस्सा माने गए हैं तो उनके संरक्षण की संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी सरकार पर है। पर्यावरणीय तथ्यों की अनदेखी भविष्य में गंभीर कानूनी और पारिस्थितिक संकट उत्पन्न कर सकती है।

एंटी माइनिंग एक्टिविस्ट, सीकर के रामअवतार गुर्जर ने कहा कि अनियंत्रित खनन ने अरावली के अनेक हिस्सों को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। अब समय आ गया है कि शेष बची पर्वत श्रृंखलाओं को वैज्ञानिक आधार पर पूर्ण संरक्षण दिया जाए। शाहबाद क्षेत्र को बचाना पूरे अरावली क्षेत्र के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

जागो किसान, झालावाड़ के अध्यक्ष वरदान सिंह हाड़ा ने कहा कि अरावली क्षेत्र की पहाड़ियां किसानों के लिए प्राकृतिक जलसंग्रहण प्रणाली का कार्य करती हैं। इनके सुरक्षित रहने से भूजल, खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहती है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को किसानों के हितों से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति, झालावाड़ के सोशल मीडिया प्रभारी शशांक श्रोत्रिय ने कहा कि शाहबाद जंगल बचाओ आंदोलन अब केवल बारां तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देशव्यापी जनअभियान का रूप ले चुका है। उन्होंने युवाओं से सोशल मीडिया और जनजागरण के माध्यम से अरावली संरक्षण अभियान से जुड़ने तथा वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित जनमत तैयार करने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के अंत में मुकेश सोनी, भानु गुप्ता और गब्बर सिंह यदुवंशी ने सभी सहभागी पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। बैठक का समापन पूर्वी राजस्थान के अरावली क्षेत्र को वैज्ञानिक आधार पर संरक्षण दिलाने, शाहबाद की निजी हाइड्रो पावर परियोजना निरस्त कराने तथा जंगल, वन्यजीव और जलस्रोतों की रक्षा के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने के सर्वसम्मत संकल्प के साथ हुआ।

Pratahkal Bureau

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