बारां। राजस्थान की गौरवशाली लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के संकल्प के साथ राजस्थान दिवस के उपलक्ष्य में राजकीय संग्रहालय बारां में एक भव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग, राजस्थान सरकार, राजकीय संग्रहालय बारां तथा इंटेक बारां चैप्टर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य विषय 'राजस्थान की लोक सांस्कृतिक धरोहरें' रहा, जिसमें प्रबुद्धजनों ने संस्कृति के विविध आयामों पर गहरा प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का गरिमामय शुभारंभ माँ सरस्वती के सम्मुख दीप प्रज्वलन एवं पूजन के साथ हुआ। इस अवसर पर नाथूलाल निर्भय ने भावपूर्ण सरस्वती वंदना की सुमधुर प्रस्तुति देकर संपूर्ण वातावरण को सांस्कृतिक गरिमा से ओत-प्रोत कर दिया। तत्पश्चात संदीप सिंह जादौन द्वारा उपस्थित अतिथियों का माल्यार्पण कर आत्मीय स्वागत किया गया। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि गायत्री परिवार बारां के जिला समन्वयक चंद्रप्रकाश सांखला ने अपने प्रभावी उद्बोधन में रेखांकित किया कि राजस्थान की अनूठी लोक परंपराएँ ही वैश्विक स्तर पर हमारी वास्तविक पहचान हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन अमूल्य धरोहरों को संरक्षित करना केवल सरकारी संस्थाओं का ही नहीं, अपितु समाज के प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। सांखला ने विशेष रूप से युवाओं का आह्वान किया कि वे अपनी जड़ों और लोकसंस्कृति से जुड़कर इसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए आगे बढ़ाएँ।

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे इंटेक बारां चैप्टर के अतिरिक्त सहायक कन्वीनर जगदीश शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि लोककला, लोकगीत, लोकनृत्य और सदियों पुरानी परंपराएँ हमारी सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। उन्होंने इन धरोहरों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए निरंतर प्रयासों और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित इंटेक मांगरोल के कन्वीनर रामदास शर्मा ने सामुदायिक भागीदारी को केंद्र में रखते हुए कहा कि जब तक स्थानीय समुदाय अपनी विरासत के प्रति जागरूक नहीं होगा, तब तक संरक्षण के प्रयास पूर्णतः सफल नहीं हो सकते। उन्होंने इस दिशा में इंटेक द्वारा किए जा रहे कार्यों की भी जानकारी दी।

एक अन्य विशिष्ट अतिथि संदीप सिंह जादौन ने संग्रहालयों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संग्रहालय केवल प्राचीन वस्तुओं के प्रदर्शन स्थल मात्र नहीं हैं, बल्कि ये अतीत और वर्तमान के मध्य सांस्कृतिक संवाद के जीवंत केंद्र हैं। कार्यक्रम के दौरान डॉ. तेजकरण गालव ने भी वैचारिक दृष्टिकोण साझा करते हुए कहा कि राजस्थान की लोकसंस्कृति में समावेशिता, प्रकृति प्रेम और गहन जीवन-दर्शन समाहित है, जिसे आधुनिक पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुँचाना समय की मुख्य मांग है।

संगोष्ठी के समापन पर धन्यवाद ज्ञापन के माध्यम से सभी का आभार व्यक्त किया गया। इस बौद्धिक समागम में शहर के प्रबुद्ध नागरिकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों एवं संस्कृति प्रेमियों की सक्रिय सहभागिता ने चर्चा को और अधिक सार्थक बनाया। कार्यक्रम के अंत में समस्त वक्ताओं ने एक स्वर में राजस्थान की लोक सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए सामूहिक एवं संगठित प्रयासों की अनिवार्यता पर बल दिया, ताकि प्रदेश की यह अमूल्य थाती अक्षुण्ण बनी रहे।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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