बारां में मुनिश्री गुरुदत्त सागर महाराज ने दिया धर्मोपदेश
जैन मुनि गुरुदत्त सागर जी महाराज ने मनुष्य जीवन की सार्थकता बताते हुए आत्म-कल्याण के लिए तप और संयम पर बल दिया।

तस्वीर में बाईं ओर क्षुल्लक श्री मेरुदत्त सागर जी महाराज और दाईं ओर माइक पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते मुनिश्री गुरुदत्त सागर जी महाराज बारां के संत भवन में नजर आ रहे हैं।
परम पूज्य आचार्य श्री 108 निर्भय सागर जी मुनिराज के सुयोग्य शिष्य मुनिश्री 108 गुरुदत्त सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री 108 मेरुदत्त सागर जी महाराज ससंघ इन दिनों बारां के संत भवन में विराजमान हैं। गुरुवार को उनके पावन सान्निध्य में भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा श्रद्धा-भक्ति के साथ संपन्न हुई। इसके पश्चात आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मोपदेश का लाभ लिया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री 108 गुरुदत्त सागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य शरीर भोग के लिए नहीं, बल्कि तप, संयम और आत्मकल्याण के लिए मिला है। उन्होंने कहा, "तन मिला है तो तप करो।" यदि मनुष्य इस दुर्लभ जीवन को तपस्या और धर्म साधना में लगाता है तो कर्मों का क्षय होता है और आत्मा परमात्मा पद की ओर अग्रसर होती है।
उन्होंने कहा कि जो तपता है, वही कुंदन बनता है। जिस प्रकार बिना आग में तपे सोना कुंदन नहीं बन सकता और बिना सिके रोटी स्वादिष्ट नहीं बनती, उसी प्रकार बिना तप के आत्मा भी निर्मल नहीं हो सकती। दूध में घी और तिल में तेल छिपा होता है, लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए मंथन और परिश्रम करना पड़ता है। इसी प्रकार आत्मा में परमात्मा बनने की अनंत शक्ति विद्यमान है, जिसे तप, साधना और संयम के माध्यम से ही प्रकट किया जा सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि उपवास का वास्तविक अर्थ "उप" अर्थात समीप और "वास" अर्थात निवास है, यानी अपनी आत्मा के समीप आना ही सच्चा उपवास है। उन्होंने कहा कि उपवास के दौरान अधिक से अधिक धर्मश्रवण, मनन, स्वाध्याय और साधना करनी चाहिए, ताकि जीवन में आध्यात्मिक जागृति आए और भगवान की वाणी जीवन का मार्गदर्शन कर सके।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में साधना की अपेक्षा विराधना अधिक हो रही है। स्वच्छता का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि घर का कचरा बाहर फेंकना केवल गंदगी फैलाना नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से विमुख होना भी है। गंदगी से बीमारियां फैलती हैं और ऐसे आचरण से घर की समृद्धि भी प्रभावित होती है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि पूजा केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए। तैयार पूजा की थाली पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के साथ भगवान का पूजन करें। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए इसे तप, संयम, सेवा और धर्म साधना में लगाकर ही सार्थक बनाया जा सकता है।
धर्मसभा के उपरांत मुनिश्री की आहारचर्या संपन्न हुई। इस अवसर पर बताया गया कि संत भवन में प्रतिदिन श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक एवं ज्ञानवर्धक कक्षाओं का आयोजन किया जाएगा, जिनमें धर्म, संस्कार, आचार-विचार और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रशिक्षण दिया जाएगा। धर्मसभा में समाज के बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। धार्मिक आयोजन ने तप, संयम, स्वच्छता और आत्मकल्याण के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया।

Pratahkal Bureau
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