बारां। राजकीय प्राथमिक विद्यालय राजपुरा, बारां की अध्यापिका मंजू गर्ग ने मीडिया के एक वर्ग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि हाल के दिनों में कुछ चुनिंदा समाचार पत्रों और फर्स्ट इंडिया न्यूज जैसे माध्यमों द्वारा डमी शिक्षक प्रकरण में उनके विरुद्ध लगातार तथ्यहीन व फर्जी खबरें प्रकाशित की जा रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पूरी कवायद उन्हें बदनाम करने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है।

कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या और विभागीय दबाव

मंजू गर्ग के अनुसार, "हाईकोर्ट आदेश दिनांक 31 जुलाई 2024 के अनुसार उच्च न्यायालय (एकल पीठ) ने डमी शिक्षक समस्या पर नीतिगत टिप्पणियां की। इसमें न कोई गिरफ्तारी आदेश था, न वसूली आदेश और न ही कोई आपराधिक निष्कर्ष; बस मेरे निलंबन को नियमों के अनुसार वैध माना गया था। साथ ही न्यायालय ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी को किसी भी अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले मेरा पक्ष सुनने का आदेश भी दिया था। इसके बावजूद, मीडिया के आर्टिकल्स से प्रभावित होकर और दबाव में आकर, मेरे पक्ष को सुने बिना ही रिकवरी के आदेश जारी कर दिए गए।"

याचिका खारिज होने के दावों का खंडन

गत 6 मार्च 2025 के आदेश पर स्थिति स्पष्ट करते हुए अध्यापिका ने बताया कि "उच्च न्यायालय एकल पीठ अनूप दंड द्वारा दिए गए आदेश में 'फंटस ऑफिसियो' (Functus Officio) शब्द का अर्थ यह है कि एक पीठ इस मामले में आदेश देने की स्थिति में नहीं है और उचित मंच पर जाएं। इसका मतलब यह है कि याचिका खारिज नहीं हुई बल्कि केवल मंच बदला गया है, लेकिन मीडिया ने इसे 'याचिका खारिज' और 'राहत से इंकार' जैसी भ्रामक सुर्खियों के साथ प्रस्तुत किया।"

मीडिया ट्रायल और मानहानि का आरोप

अध्यापिका मंजू गर्ग ने बताया कि मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे झूठ जैसी कुछ खबरों में दावा किया गया कि हाईकोर्ट ने फटकार लगाई, आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई, करोड़ों का गबन, माफी याचिका खारिज, त्वरित कार्यवाही के आदेश और मंजू गर्ग फरार चल रही है आदि। इनमें से एक बात भी न्यायालय के आदेश में नहीं है। सच तो यह है कि मैं बीकानेर मुख्यालय पर लगातार उपस्थिति दे रही हूं। विभाग व कोर्ट से अभी तक कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं आया है और न कोई दोष सिद्ध हुआ है। इसके बावजूद आरोपी और गबनकर्ता जैसे शब्दों का प्रयोग करना सीधा ट्रायल बाय मीडिया और मानहानि है।

न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास

हाईकोर्ट के नाम पर झूठी टिप्पणियां जोड़ना, आदेश को तोड़-मरोड़ कर पेश करना और व्यक्तियों को दोषी बताना, यह न केवल मानहानि है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास भी है। मंजू गर्ग ने अंत में यह भी जोड़ा कि "नियोजित दुष्प्रचार और एक ही प्रकार की भ्रामक खबरें बार-बार उन्हीं लेखकों द्वारा व उन्हीं मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर आना यह दर्शाता है कि यह त्रुटि नहीं बल्कि एक सुनियोजित अभियान है।"

Pratahkal Bureau

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