गुरु के सानिध्य में धर्म ध्यान से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है: बारां में मुनिश्री गुरुदत्त सागर
बारां के संत भवन में विराजमान मुनिश्री 108 गुरुदत्त सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री 108 मेरुदत्त सागर जी महाराज ने धर्मसभा में मोक्ष मार्ग, गुरु के सानिध्य, धर्म ध्यान और चातुर्मास के महत्व पर प्रवचन दिए। जैन जोड़ला मंदिर में अभिषेक, शांतिधारा और आहारचर्या भी श्रद्धापूर्वक संपन्न हुई।

तस्वीर में बाईं ओर क्षुल्लक मेरुदत्त सागर जी महाराज और दाईं ओर मुनिश्री गुरुदत्त सागर जी महाराज धर्मोपदेश देते हुए दिखाई दे रहे हैं।
बारां के संत भवन में इन दिनों परम पूज्य आचार्य श्री 108 निर्भय सागर जी मुनिराज के सुयोग्य शिष्य मुनिश्री 108 गुरुदत्त सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री 108 मेरुदत्त सागर जी महाराज ससंघ विराजमान हैं। शुक्रवार को उनके पावन सान्निध्य में जैन जोड़ला मंदिर में भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुई। इसके बाद आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मोपदेश का लाभ लिया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए क्षुल्लक श्री 108 मेरुदत्त सागर जी महाराज ने कहा कि जो वन की ओर गए, वे स्वयं को बना गए, जबकि जो केवल घर-गृहस्थी में उलझे रहे, वे वहीं तक सीमित रह गए। उन्होंने कहा कि मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को जीवन में अपनाना आवश्यक है। घर में रहने से सांसारिक मोह और पाप बढ़ते हैं, जबकि गुरु की शरण में आने से पुण्य का संचय होता है। इसलिए अधिक से अधिक समय मंदिर में आकर धर्म का लाभ लेना चाहिए।
उन्होंने घड़ी के तीन कांटों का उदाहरण देते हुए कहा कि सबसे तेज चलने वाला सेकंड का कांटा बचपन का प्रतीक है, जो पलभर में बीत जाता है। मिनट का कांटा युवावस्था और गृहस्थ जीवन का प्रतीक है, जिसमें व्यक्ति परिवार और आजीविका की जिम्मेदारियों में उलझकर धर्म से दूर हो जाता है। वहीं घंटे का कांटा जीवन के अंतिम पड़ाव का प्रतीक है, जहां मनुष्य के सामने संसार और मोक्ष, दोनों मार्ग खुले होते हैं। अब यह प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह किस मार्ग का चयन करता है।
मुनिश्री 108 गुरुदत्त सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि साधु-संतों के सानिध्य में बैठने से धर्म ध्यान स्वतः प्रारंभ हो जाता है, जबकि घर-गृहस्थी में मनुष्य अनेक बार पाप और रौद्र परिणामों में फंस जाता है। उन्होंने कहा कि मंदिर में भगवान प्रेरणा देते हैं, लेकिन गुरु गलत मार्ग पर चलने से तुरंत रोकते हैं और सही दिशा दिखाते हैं। इसी कारण गुरु को प्रेरक और जीवन का सच्चा मार्गदर्शक कहा गया है।
उन्होंने कहा कि जिस नगर में संतों का विराजमान होना होता है, वहां प्रतिदिन त्योहार जैसा वातावरण रहता है। होली, दीपावली और दशहरा कुछ दिनों के पर्व हैं, लेकिन संतों का सानिध्य जीवन को निरंतर आनंद और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि चातुर्मास का समय अत्यंत पुण्यदायी होता है। इस काल में जितना अधिक धर्म, स्वाध्याय, भक्ति और साधना का लाभ लिया जाए, वही आत्मकल्याण का वास्तविक मार्ग बनता है।
धर्मसभा के उपरांत मुनिश्री की आहारचर्या संपन्न हुई। इस अवसर पर जानकारी दी गई कि संत भवन में प्रतिदिन श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक एवं ज्ञानवर्धक कक्षाओं का आयोजन किया जा रहा है, जिनमें धर्म, संस्कार, आचार-विचार एवं आध्यात्मिक ज्ञान का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। धर्मसभा में समाज के बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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