बारां: जीवन भर बेजुबानों के मसीहा रहे डॉ. चौहान का महादान, मरणोपरांत नेत्रदान से रोशन होंगी दो जिंदगियां
बारां के सेवानिवृत्त पशु चिकित्सक डॉ. नरेंद्र कुमार चौहान ने निधन के पश्चात नेत्रदान कर मानवता की अनूठी मिसाल पेश की है। इंदिरा मार्केट निवासी डॉ. चौहान के परिवार ने दुख की घड़ी में साहसिक निर्णय लेते हुए शाइन इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से दो दृष्टिहीन व्यक्तियों के जीवन को रोशन करने का संकल्प पूरा किया। पढ़िए बेजुबानों की सेवा करने वाले एक डॉक्टर की अंतिम विदाई की प्रेरक गाथा।

बारां। मानवता की सेवा केवल जीवित रहते हुए ही नहीं, बल्कि मृत्यु के उपरांत भी की जा सकती है, इस उक्ति को बारां के एक कर्मयोगी परिवार ने चरितार्थ कर दिखाया है। शहर के इंदिरा मार्केट निवासी एवं सेवानिवृत्त पशु चिकित्सक डॉ. नरेंद्र कुमार चौहान (78 वर्ष) के निधन के बाद, उनके शोकाकुल परिवार ने असीम धैर्य और साहस का परिचय देते हुए उनका नेत्रदान करवाया। जीवन भर मूक पशुओं के दर्द को अपनी संवेदनाओं से समझने वाले डॉ. चौहान अब अपनी मृत्यु के पश्चात दो दृष्टिहीन व्यक्तियों के जीवन में उजाला फैलाएंगे। उनका यह निर्णय न केवल उनके सेवाभावी व्यक्तित्व का प्रमाण है, बल्कि समाज के लिए एक अनुकरणीय मिसाल भी बन गया है।
जैसे ही डॉ. चौहान के देवलोकगमन का समाचार प्राप्त हुआ, भारत विकास परिषद के सदस्य राजेंद्र डंग और हरीश विजय ने तुरंत संवेदनशीलता दिखाई। उन्होंने नेत्रदान के महत्व को समझते हुए शाइन इंडिया फाउंडेशन के जिला संयोजक हितेश खंडेलवाल से संपर्क साधा। सूचना की गंभीरता को देखते हुए हितेश खंडेलवाल ने अविलंब कोटा स्थित शाइन इंडिया फाउंडेशन के मुख्यालय को सूचित किया। समन्वय स्थापित होने के पश्चात, फाउंडेशन के डॉ. कुलवंत गौड़ कोटा से बारां पहुंचे और पूरी गरिमा व सम्मान के साथ नेत्र उत्सर्जन की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न कराया। इस तत्परता ने सुनिश्चित किया कि डॉ. चौहान का संकल्प और परिवार की भावना व्यर्थ न जाए।
डॉ. नरेंद्र कुमार चौहान अपने पीछे एक भरा-पूरा और संस्कारवान परिवार छोड़ गए हैं। उनके परिवार में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कैलाश बाई, पुत्र ओम चौहान (40 वर्ष) तथा दो पुत्रियां हेमलता (48 वर्ष) और रीना चौहान (38 वर्ष) हैं। पिता के बिछड़ने के गहरे आघात और दुख की घड़ी में भी पुत्र ओम चौहान और उनकी बहनों ने मानवता के प्रति अपने दायित्व को सर्वोपरि रखा। सामाजिक हित में लिया गया उनका यह साहसिक निर्णय आज चर्चा का विषय बना हुआ है। शहर के गणमान्य नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने चौहान परिवार के इस पुनीत कार्य की मुक्त कंठ से सराहना की है।
पशु चिकित्सा विभाग से सेवानिवृत्त डॉ. चौहान ने अपना संपूर्ण जीवन बेजुबान प्राणियों के उपचार और उनकी रक्षा में समर्पित कर दिया था। अब उनके जाने के बाद, उनकी आंखों के माध्यम से दो ऐसे लोग इस सुंदर सृष्टि को देख सकेंगे जो अब तक अंधकार में जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक चिकित्सक के रूप में सेवा का जो सिलसिला उन्होंने दशकों पहले शुरू किया था, वह आज उनके न रहने पर भी अटूट बना हुआ है। यह घटना संदेश देती है कि अंगदान और नेत्रदान के माध्यम से इंसान अमर हो सकता है और दूसरों के जीवन को नया आधार दे सकता है।

Pratahkal Bureau
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