राजस्थान के बारां जिला मुख्यालय पर पिछले कुछ समय से अपराधियों की बढ़ती करगुजारियों ने आम जनजीवन को दहशत में डाल दिया है। जिले में कानून व्यवस्था की स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि अब यहाँ बिहार और बंगाल के पैटर्न पर अपराध पनपने लगा है। पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों का कहना है कि पुलिस केवल अपनी हताशा मिटाने के लिए चाय-पान की गुमटियों और थड़ियों पर खड़े निर्दोष लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर अपनी पीठ थपथपा रही है, जबकि उसे यह समझना होगा कि हर खड़ा व्यक्ति अपराधी नहीं होता। पुलिस को अपनी कार्रवाई से पूर्व अपराधियों की सही पहचान सुनिश्चित करनी होगी।

वर्तमान में बारां पुलिस की स्थिति 'सांप गुजर जाने के बाद लाठी पीटने' जैसी हो गई है। जब भी पुलिस को किसी अपराध की सूचना या संभावना के बारे में अवगत कराया जाता है, तो अक्सर अधिकारी उसे हवा में उड़ा देते हैं। व्यापारियों और संभ्रांत व्यक्तियों द्वारा दिए गए सुरक्षा सुझावों को प्राथमिकता न देना पुलिस की बड़ी विफलता साबित हो रही है। जिले में चोरी, लूट और हत्या जैसी वारदातों के बाद अब सरेआम बंदूक की नोक पर अपहरण जैसी संगीन घटनाएं होने लगी हैं। दुस्साहस का आलम यह है कि अपहरण की घटना के अगले ही दिन बिट्टू शर्मा हत्याकांड के फरार बदमाशों ने सोशल मीडिया के जरिए एक व्यक्ति से एक लाख रुपये की फिरौती मांग ली। पीड़ित भरत कुम्हार ने इस संबंध में कोतवाली थाने में प्रकरण दर्ज कराया है, जिस पर पुलिस जांच का दावा कर रही है।

शहर की बिगड़ती स्थिति पर व्यापार महासंघ के अध्यक्ष योगेश बाटा, देवकीनंदन बंसल और ललित मोहन खंडेलवाल ने पुलिस को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि अपराधियों पर सख्ती जरूरी है, लेकिन कार्रवाई की आड़ में किसी संभ्रांत नागरिक को निशाना न बनाया जाए। आरोप है कि थानों की स्थिति अब ऐसी हो गई है कि 'जो जितना घी हवन में डालेगा, पुलिस उसके लिए उतनी ही स्वाहा बोलेगी'। गरीब और सामान्य व्यक्ति की थानों में दुर्गति हो रही है, जबकि निष्क्रिय और लालची पुलिसकर्मियों के कारण शहर अपराध के बारूद के ढेर पर बैठा है। इस पूरे घटनाक्रम में जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी संदेहास्पद है, जो केवल बड़ी घटना के बाद नाटकीय अंदाज में औपचारिक आश्वासन देते हैं, जिनका कोई मुकम्मल परिणाम नहीं निकलता।

हाल ही में हॉस्पिटल रोड शिव कॉलोनी के ग्लास व्यापारी सतीश गौड का आधा दर्जन बदमाशों ने बंदूक की नोक पर अपहरण किया और एक करोड़ की फिरौती मांगी। अंततः 30 लाख रुपये में सौदा तय होने के बाद उन्हें रिहा किया गया। इस मामले में व्यापारी की जिस प्रकार 'रेकी' की गई, उससे आशंका जताई जा रही है कि इसमें उनके संस्थान के कर्मचारी या कोई नजदीकी व्यक्ति शामिल हो सकता है। इस वारदात ने व्यापार संघ और नागरिकों के आक्रोश को चरम पर पहुँचा दिया है। जानकारों का मानना है कि पुलिस का मुखबिर तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है क्योंकि कई पुलिसकर्मियों की साठगांठ सीधे अपराधियों, सटोरियों और तस्करों से है, जहाँ से उन्हें अवैध लाभ प्राप्त होता है। अब पूरी उम्मीदें युवा पुलिस अधीक्षक अभिषेक अंदासु की कार्यप्रणाली पर टिकी हैं कि वे किस प्रकार जिले की कानून व्यवस्था को पटरी पर लाते हैं। हालांकि, अपहरण के मामले में पुलिस को कुछ अहम सुराग मिलने की सूचना है, जो भविष्य की कार्रवाई की दिशा तय करेंगे।

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