बारां: 1857 के क्रांतिकारियों के अपमान पर डॉ. मोहनलाल साहू की चेतावनी
कोटा जनक्रांति के नायकों के लिए प्रयुक्त अपमानजनक शब्दों वाली पट्टिका को हटाने की मांग को लेकर इतिहासकारों ने जिला प्रशासन के खिलाफ आंदोलन का आह्वान किया है।

बारां। 1857 की क्रांति के भारतीय सिपाहियों और नायकों को हत्यारे, खून के प्यासे और बदमाश बताना तथा अंग्रेजों को वीर कहना, इतिहास के पन्नों में क्रांति के नायकों का घोर अपमान है। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के क्षेत्रीय संगठन सचिव प्रोफेसर डॉ. मोहनलाल साहू ने इस पर कड़ा आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा है कि क्रांतिकारियों के प्रति ऐसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इतिहासकार इस कृत्य की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए विरोध दर्ज करा रहे हैं।
कोटा का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और जनक्रांति का गौरव
डॉ. मोहनलाल साहू ने बताया कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कोटा की क्रांति का नेतृत्व किसी ठाकुर या नरेश ने नहीं किया था, बल्कि यह एक वास्तविक जन क्रांति थी। इस ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व जयदयाल और मेहराब खान ने किया था। इस दौरान क्रांतिकारियों का लगभग छह माह तक कोटा पर पूर्ण अधिकार रहा था। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 30 मार्च 1858 को मेजर जनरल रोबर्ट्स और करौली के नरेश की मदद से अंग्रेजों ने पुनः कोटा पर आधिपत्य स्थापित किया था।
विवादित पट्टिका और ऐतिहासिक घटनाक्रम
क्रांति के घटनाक्रम के अनुसार, 15 अक्टूबर 1857 को क्रांतिकारियों ने कोटा की ब्रिटिश रेजिडेंसी पर हमला कर दिया था। इस संघर्ष में रेजिडेंट मेजर बर्टन और उसके दो पुत्रों, सैडलर एवं काण्टम को मौत के घाट उतार दिया गया था। क्रांति का दमन होने के बाद उनकी कब्र पर एक पट्टिका लगाई गई थी। उक्त घटना को 148 वर्ष बीत चुके हैं और अंग्रेजों को भारत छोड़े 79 वर्ष हो गए हैं, लेकिन क्रांतिकारियों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने वाली और गुलामी की मानसिकता को प्रकट करने वाली यह पट्टिका अभी भी सीना ताने खड़ी है।
प्रशासन की चुप्पी और इतिहासकारों का बढ़ता रोष
समाचार पत्रों के माध्यम से पिछले 5 दिनों से लगातार इस मुद्दे पर जन-विरोध हो रहा है। लगभग 40 इतिहासकारों ने इसे अनुचित बताते हुए विवादित पट्टिका को हटाने की मांग की है, लेकिन जिला और संभाग प्रशासन अभी तक मौन साधे हुए है। डॉ. साहू ने स्पष्ट किया कि जिला प्रशासन को स्वयं संज्ञान लेकर इस पट्टिका को तुरंत हटाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इसे नहीं हटाया गया, तो हाडोती संभाग के सभी इतिहासकारों को आंदोलन और प्रदर्शन का रास्ता अपनाना पड़ेगा, जिसकी समस्त जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
इतिहासकारों ने सुर में सुर मिलाया
इस विरोध प्रदर्शन में इतिहासकार डॉ. बाबूलाल भाट (चित्तौड़ प्रांत उपाध्यक्ष), ज़िलाध्यक्ष प्रो. डॉ. आदित्य गुप्ता, जिला महामंत्री नवनीत स्वरूप, डॉ. डी. पी. त्रिपाठी, प्रो. जे. पी. चौधरी, प्रो. सुव्रत शर्मा और डॉ. सुरेश मेघवाल सहित कई प्रबुद्धजनों ने अपना कड़ा विरोध जताया है। उनका मानना है कि ऐसी पट्टिकाएं भारतीयों के स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुंचाती हैं।

Rajendra Sharma, Baran
नाम: राजेंद्र शर्मा
वर्तमान पद: संवाददाता | प्रांतीय प्रचार प्रमुख (भारत तिब्बत सहयोग मंच)
कार्यक्षेत्र: बारां (राजस्थान)
बीट (मुख्य विषय): राजनीतिक, आपराधिक, समसामयिक, सामाजिक, धार्मिक, पर्यटक स्थल एवं ऐतिहासिक धरोहर
परिचय
राजेंद्र शर्मा राजस्थान के बारां क्षेत्र के एक अत्यंत वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार हैं। वह वर्तमान में संवाददाता के रूप में कार्य करने के साथ-साथ 'भारत तिब्बत सहयोग मंच' में प्रांतीय प्रचार प्रमुख का दायित्व भी संभाल रहे हैं। राजेंद्र शर्मा मुख्य रूप से राजनीतिक व आपराधिक मामलों, समसामयिक और सामाजिक विषयों सहित क्षेत्र के धार्मिक, पर्यटक स्थलों तथा ऐतिहासिक धरोहरों पर विशेष रूप से रिपोर्टिंग करते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव (Work Experience)
- राजेंद्र शर्मा वर्ष 1994 से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। पिछले तीन दशकों से अधिक के अपने करियर में उन्होंने देश और राज्य के कई बड़े मीडिया संस्थानों में विभिन्न पदों पर कार्य किया है:
- राजस्थान पत्रिका (1992–1994): सहायक संवाददाता के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की।
- दैनिक भास्कर (1996/97–2000): फाउंडर ब्यूरो चीफ के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली।
- दैनिक नवज्योति (2000 से): लगभग 9 वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं।
- दैनिक जननायक: 5 वर्षों तक नियमित कार्य किया।
- अन्य राष्ट्रीय व क्षेत्रीय समाचार पत्र: उन्होंने 'राष्ट्रदूत', कोटा के साप्ताहिक समाचार पत्र 'शिल्पांगी', तथा 1 वर्ष तक 'जनसत्ता' और 'हिंदुस्तान टाइम्स' में भी कार्य किया है।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने वाणिज्य स्नातक (B.Com) की डिग्री हासिल की है।
