लगभग दो अरब वर्ष पुरानी और सात सौ किलोमीटर में फैली अरावली पर्वतमाला आज अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। पर्यावरणविदों, कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह 'अरावली विरासत जन अभियान' ने एक भयावह चेतावनी जारी की है कि यदि समय रहते अरावली के विनाश को नहीं रोका गया, तो थार मरुस्थल का विस्तार उत्तर भारत के व्यापक हिस्सों को रेगिस्तान में बदल देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला, जो एक प्राकृतिक दीवार की तरह कार्य करती है, के नष्ट होने से न केवल पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की जलवायु और जल सुरक्षा भी गंभीर खतरे में पड़ जाएगी।

अरावली के संरक्षण के लिए उठती आवाजों के बीच, केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय (MoEF&CC) की भूमिका और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 25 मई 2026 को गठित नई समीक्षा समिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। अभियान से जुड़े पर्यावरणविदों का तर्क है कि मंत्रालय के अधीन रहकर निष्पक्ष समीक्षा संभव नहीं है। अतः मांग की गई है कि समिति के अध्यक्ष और सदस्य सचिव मंत्रालय के प्रभाव से मुक्त स्वतंत्र पारिस्थितिकी विशेषज्ञ हों और अपनी विस्तृत रिपोर्ट सीधे सर्वोच्च न्यायालय को सौंपें। इस संदर्भ में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) की सितंबर 2025 की उस रिपोर्ट की जांच की मांग भी की जा रही है, जिसने अरावली जिलों की संख्या 63 से घटाकर 37 कर दी थी, जबकि मांग है कि मथुरा स्थित गोवर्धन पर्वत सहित सभी 64 जिलों को इस संरक्षण दायरे में शामिल किया जाना चाहिए।

समीक्षा की प्रक्रिया को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रखने का आग्रह करते हुए विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि समिति को हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के खनन प्रभावित क्षेत्रों का धरातलीय दौरा करना चाहिए और वहां के निवासियों से संवाद स्थापित करना चाहिए। साथ ही, 31 अगस्त 2026 की निर्धारित समयसीमा को बढ़ाने की अपील की गई है ताकि पिछले पांच दशकों में हुए अनियंत्रित खनन, रियल एस्टेट विस्तार और कचरा निस्तारण के सामाजिक, स्वास्थ्य और भू-जल स्तर पर पड़े दुष्प्रभावों का राष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से समग्र अध्ययन हो सके। नीलम अहलूवालिया के अनुसार, अरावली में पिछले कुछ दशकों में 12 से अधिक बड़े अवरोध बन चुके हैं, जिसके कारण थार मरुस्थल की धूल अब दिल्ली-एनसीआर और उत्तर प्रदेश तक पहुंचने लगी है।

इस पूरे प्रकरण में 'प्रदूषक भुगतान सिद्धांत' को लागू करने की मांग भी जोर पकड़ रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अवैध खनन और अत्यधिक जल दोहन में लिप्त कंपनियों व जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए, जैसा कि पूर्व में गोवा, कर्नाटक और ओडिशा के खनन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनिश्चित किया गया था। अंततः, अरावली को बचाने के लिए नागरिक समाज अब एक ही मांग पर केंद्रित है कि अरावली की अस्पष्ट कानूनी परिभाषाओं को समाप्त कर इसके पूर्ण 700 किलोमीटर क्षेत्र को 'अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र' घोषित किया जाए। यह कदम न केवल पारिस्थितिकी की सुरक्षा करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल और जलवायु की जीवनदायिनी सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगा।

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