अरावली संरक्षण में बारां को प्रतिनिधित्व की मांग, सुप्रीम कोर्ट समिति से शाहबाद घाटी संघर्ष समिति की अपील
अरावली संरक्षण को लेकर बारां को प्रतिनिधित्व देने की मांग तेज, शाहबाद घाटी समिति ने सुप्रीम कोर्ट समिति से जमीनी अध्ययन की अपील की।

तस्वीर में बारां जिले के शाहबाद घाटी क्षेत्र में अरावली पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बहता हुआ एक प्राकृतिक जलप्रपात दिखाई दे रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्च-स्तरीय समिति की अरावली पर्वतमाला से संबंधित ऑनलाइन जन-परामर्श प्रक्रिया में बारां सहित अरावली से जुड़े छूटे हुए जिलों को प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाई गई है। शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति, बारां ने इस प्रक्रिया का स्वागत करते हुए कहा है कि पहल तभी प्रभावी और न्यायसंगत होगी, जब सभी वास्तविक अरावली क्षेत्रों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
समिति के संरक्षक प्रशांत पाटनी ने कहा कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) की रिपोर्ट में बारां जिले को भी अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े जिलों में शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि यह तथ्य बताता है कि दक्षिण-पूर्वी राजस्थान का यह क्षेत्र अरावली की भौगोलिक, पारिस्थितिक एवं सांस्कृतिक निरंतरता का अभिन्न हिस्सा है।
प्रशांत पाटनी ने कहा कि उच्च-स्तरीय समिति को केवल ईमेल और गूगल फॉर्म के माध्यम से सुझाव लेने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने मांग की कि समिति बारां, शाहबाद, किशनगंज एवं आसपास के वन क्षेत्रों का प्रत्यक्ष दौरा कर स्थानीय समुदायों, वनवासियों, पर्यावरणविदों और जनसंगठनों से संवाद करे, ताकि क्षेत्र की वास्तविक स्थिति रिपोर्ट में शामिल हो सके।
उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हलफनामे में जिन अनेक जिलों को अरावली की सूची से बाहर रखा गया, उनमें वास्तविक भौगोलिक एवं पारिस्थितिक स्थिति का समुचित प्रतिबिंब दिखाई नहीं देता। उनका कहना था कि यदि समिति जमीनी अध्ययन करेगी तो स्पष्ट होगा कि बारां जिले के वन, पहाड़ियां, जलागम क्षेत्र और जैव विविधता अरावली पारिस्थितिकी तंत्र से गहराई से जुड़े हुए हैं।
समिति ने मांग की कि अंतिम रिपोर्ट तैयार करते समय फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक निष्कर्षों को प्रमुख आधार बनाया जाए तथा बारां सहित सभी वास्तविक अरावली क्षेत्रों को संरक्षण के दायरे में शामिल किया जाए।
समिति के संरक्षक बृजेश विजयवर्गीय ने कहा कि अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की जल, वन और जैव विविधता सुरक्षा की जीवनरेखा है। उन्होंने कहा कि बारां जिले को अरावली क्षेत्र का हिस्सा मानने से यहां के वनों, वन्यजीवों, जलस्रोतों और स्थानीय समुदायों को अधिक प्रभावी संरक्षण प्राप्त होगा।
बृजेश विजयवर्गीय ने उच्च-स्तरीय समिति से जन-परामर्श की समय-सीमा बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक जनसुनवाई आयोजित करने और स्थानीय भाषाओं में सूचना उपलब्ध कराकर अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की।
शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति, बारां के संभागीय आंदोलन प्रभारी राजेंद्र कुमार जैन ने विश्वास व्यक्त किया कि सर्वोच्च न्यायालय की उच्च-स्तरीय समिति अंतिम रिपोर्ट तैयार करते समय फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक निष्कर्षों, स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान तथा जमीनी वास्तविकताओं को समान महत्व देगी।
उन्होंने कहा कि बारां सहित अरावली से जुड़े सभी क्षेत्रों को न्यायपूर्ण पहचान और प्रभावी संरक्षण मिलना पर्यावरण संरक्षण, जल सुरक्षा तथा भावी पीढ़ियों के हित में आवश्यक है।

Pratahkal Bureau
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