समाज में अक्सर 'रोटी, कपड़ा और मकान' को मूलभूत आवश्यकताओं के रूप में गिना जाता है, परंतु विकास की वृहद नीतियों में 'कपड़ा' सदैव एक उपेक्षित मुद्दा रहा है। इसी उपेक्षित जरूरत को केंद्र में रखकर एक नई सोच और बदलाव की शुरुआत करने वाले अंशु गुप्ता, जिन्हें दुनिया आज "क्लॉथमैन" के नाम से जानती है, मानवीय संवेदना और विकास का एक नया अध्याय लिख रहे हैं। वर्ष 1999 में 'गूंज' संस्थान की स्थापना करने वाले अंशु गुप्ता का यह सफर एक बेसहारा बच्ची की उस मार्मिक कहानी से प्रेरित होकर शुरू हुआ था, जिसने उन्हें अपनी जमी-जमाई कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर समाज सेवा के कठिन मार्ग पर चलने के लिए विवश कर दिया।

अंशु गुप्ता का स्पष्ट मानना है कि किसी भी जरूरतमंद के लिए "दान" के बजाय "सम्मान" अधिक महत्वपूर्ण है। इसी दूरदर्शी सोच के साथ उन्होंने ‘Cloth for Work’ (काम के बदले कपड़ा) की अनूठी अवधारणा को धरातल पर उतारा। इस पहल के माध्यम से शहरों में अनुपयोगी पड़े कपड़ों और संसाधनों को ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए एक सार्थक औजार बनाया गया है। इसके अंतर्गत गांव के लोग सड़क निर्माण, तालाबों की खुदाई और स्कूलों की मरम्मत जैसे सामुदायिक कार्यों में अपना श्रम दान करते हैं और बदले में उन्हें कपड़े व अन्य आवश्यक सामग्री प्रदान की जाती है। यह प्रक्रिया न केवल ग्रामीणों की आवश्यकताओं को पूरा करती है, बल्कि उनके आत्मसम्मान को भी सुरक्षित रखती है, जिससे उन्हें कभी भी 'भीख' लेने का अहसास नहीं होता।

अपनी इस वैचारिक यात्रा के दौरान अंशु गुप्ता ने सदैव इस बात पर जोर दिया है कि "गांव ही मेरी यूनिवर्सिटी है", क्योंकि जीवन और समाज की वास्तविक सीख उन्हें इन्हीं ग्रामीण अंचलों से प्राप्त हुई है। मानवीय गरिमा को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के उनके इस अद्वितीय और अभूतपूर्व कार्य के लिए उन्हें वर्ष 2015 में प्रतिष्ठित मैगसेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। आज 'गूंज' केवल पुराने कपड़ों का पुनर्वितरण करने वाला संस्थान मात्र नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान के जरिए ग्रामीण विकास की एक ऐसी मजबूत नींव तैयार कर रहा है, जहां हर व्यक्ति अपने श्रम के बदले गरिमापूर्ण जीवन जीने का हकदार है।

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