गंगापुर सिटी में साहित्य परिषद की संगोष्ठी, 'तत्वमसि' उपन्यास पर विमर्श

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में 'आत्मबोध से विश्वबोध' पर चर्चा हुई और आगामी प्रांतीय अधिवेशन की रूपरेखा तैयार की गई।

Update: 2026-05-27 14:33 GMT

गंगापुर सिटी के गुलकन्दी देवी आदर्श विद्या मंदिर में आयोजित अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की संगोष्ठी में मंच पर उपस्थित अध्यक्ष हनुमान मुक्त (केंद्र में), डॉ. मुकेश गर्ग व अन्य साहित्यकार। (बाएं से दाएं: कृपाशंकर उपाध्याय, बनवारी श्याम गौतम, हनुमान मुक्त, सतीश कुलचनिया, व्यंग्य पांडेय और डॉ. मुकेश गर्ग)

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की गंगापुर शाखा के तत्वावधान में रविवार, 24 मई 2026 की सायं गुलकन्दी देवी आदर्श विद्या मंदिर के प्रांगण में एक अत्यंत गरिमामयी और ऊर्जावान साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। प्रख्यात साहित्यकार हनुमान मुक्त की अध्यक्षता में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में परिषद् से जुड़े प्रबुद्ध साहित्यप्रेमियों, कवियों, पाठकों और निष्ठावान साहित्य-साधकों ने अभूतपूर्व उत्साह के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। संपूर्ण संगोष्ठी का वातावरण उच्च स्तरीय साहित्यिक ऊष्मा, प्रखर वैचारिक संवाद और आत्मीयता से सराबोर रहा, जिसने उपस्थित जनसमूह को आदि से अंत तक जोड़े रखा।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परंपरा को रेखांकित करते हुए कार्यक्रम का विधिवत शुभारम्भ माँ शारदे के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं वरिष्ठ साहित्यकार कृपाशंकर उपाध्याय द्वारा अत्यंत सुमधुर कंठ से प्रस्तुत की गई सरस्वती वंदना के साथ हुआ। इसके पश्चात्, अध्यक्षीय उद्बोधन की कमान संभालते हुए हनुमान मुक्त ने संगोष्ठी की सुदृढ़ रूपरेखा समाज के सम्मुख प्रस्तुत की और परिषद् की आगामी रचनात्मक गतिविधियों की विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए बताया कि आगामी 30 एवं 31 मई को कोटा में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् का प्रांतीय अधिवेशन आयोजित होने जा रहा है। इस प्रांतीय महाकुंभ में सवाई माधोपुर शाखा की ओर से सशक्त सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु गंगापुर सिटी से भी साहित्य परिषद के सदस्य सक्रिय रूप से भाग लेने कोटा जाएंगे। हनुमान मुक्त ने परिषद् की वैचारिक गतिविधियों को और अधिक व्यापक व धरातलीय बनाने पर विशेष बल दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से आह्वान किया कि समाज के ऐसे सभी साहित्यप्रेमियों को परिषद् से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए, जिनकी साहित्य लेखन, पठन-पाठन एवं वैचारिक गतिविधियों में वास्तविक रुचि हो। इस दूरगामी सांगठनिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने उपस्थित सभी सदस्यों से सक्रिय और निरंतर सहयोग देने का पुरजोर आग्रह किया।

संगोष्ठी के मुख्य चरण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर पराड़कर द्वारा लिखित अत्यंत चर्चित और मार्गदर्शक उपन्यास ‘तत्वमसि’ पर एक विशेष समीक्षात्मक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस कालजयी कृति पर अपनी सारगर्भित और गहन समीक्षात्मक प्रस्तुति देते हुए डॉ. मुकेश गर्ग ने कहा कि यह उपन्यास मात्र एक काल्पनिक कथा नहीं है, अपितु यह पूर्णकालिक प्रचारक एवं कार्यकर्ता जीवन के ध्येयनिष्ठ अंतःकरण का एक जीवंत, प्रामाणिक और शाश्वत दस्तावेज है। उपन्यास के भीतर संघ कार्यकर्ताओं के कठोर जीवन-व्रत, उनकी अद्वितीय कार्य शैली और समाज में व्याप्त अनेक भ्रांतियों का अत्यंत रोचक, तार्किक एवं कथात्मक ढंग से समूल निराकरण किया गया है। डॉ. गर्ग ने उपन्यास के दार्शनिक पक्ष को उजागर करते हुए आगे कहा कि ‘तत्वमसि’ मानव सभ्यता के आदि काल से निरंतर चले आ रहे उस परम मूल प्रश्न — “मैं कौन हूँ और इस संपूर्ण धरती पर मेरे जीवन का क्या प्रयोजन है?” — का एक अत्यंत सार्थक, व्यावहारिक और चिंतनपरक उत्तर समाज के सम्मुख प्रस्तुत करता है। यह अद्भुत उपन्यास समूचे विश्व को यह कालजयी संदेश देता है कि मनुष्य कर्म और नियति के मध्य आदर्श संतुलन स्थापित करते हुए, गृहस्थ जीवन के दायित्वों को निभाते हुए भी समाज एवं राष्ट्र कल्याण के महायज्ञ में अपना सर्वोत्कृष्ट और महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यह कालजयी साहित्यिक कृति प्रत्येक पाठक को आत्मावलोकन, निस्वार्थ सेवा, प्रखर राष्ट्रवाद और सामाजिक सरोकारों से युक्त एक सार्थक जीवन जीने की महती प्रेरणा देती है, तथा पाठक के मानस को बिना किसी बोझिलता के स्वतः ही गहन आध्यात्मिक व सामाजिक चिंतन की ओर अग्रसर कर देती है।

इसी वैचारिक श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए कार्यक्रम में मुख्य वक्ता श्री व्यंग्य पांडेय ने “आत्मबोध से विश्वबोध” जैसे अत्यंत गूढ़ और समसामयिक विषय पर अपने ओजस्वी विचार व्यक्त किए। उन्होंने तार्किक ढंग से प्रतिपादित किया कि किसी भी व्यक्ति के भीतर सर्वप्रथम आत्मज्ञान और स्वचेतना का जागरण होना परम आवश्यक है। जब व्यक्ति स्वयं के मूल स्वरूप और सामर्थ्य को पहचान लेता है, तभी उसके भीतर समष्टि अर्थात विश्वबोध की व्यापक चेतना का प्राकट्य होता है। उन्होंने इतिहास का संदर्भ देते हुए कहा कि वसुधैव कुटुंबकम और विश्व कल्याण के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले संसार के सभी महापुरुष पहले स्वयं के अंतस में आत्मबोध की इसी अत्यंत पवित्र प्रक्रिया से गुजरे थे। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए उन्होंने चेताया कि आज के समय में पैर पसार रही उपभोक्तावादी संस्कृति, अंतहीन युद्ध, आपसी वैमनस्य और सामाजिक पाखंड जैसी विनाशकारी प्रवृत्तियों से समूची मानवता को मुक्ति दिलाने के लिए मानव मात्र में आत्मबोध का होना और प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करना एकमात्र मार्ग है।

इसके पश्चात, वैचारिक विमर्श को और अधिक समृद्ध करते हुए संगोष्ठी में श्री कृपाशंकर उपाध्याय 'प्रीतम', बनवारी श्याम गौतम एवं श्री सतीश कुलचनिया ने भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित ‘आनंद मठ’ उपन्यास तथा “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय के विविध आयामों पर अपने अत्यंत सारगर्भित व गंभीर विचार व्यक्त किए। सभी प्रबुद्ध वक्ताओं ने एक सुर में साहित्य को समाज में वैचारिक जागृति, कुरीतियों के उन्मूलन एवं सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान का सबसे सशक्त, स्थायी और जीवंत माध्यम स्वीकार किया।

कार्यक्रम के अंतिम सोपान में उपस्थित समस्त साहित्यप्रेमियों, विचारकों और श्रोताओं ने गंगापुर सिटी में ऐसी नियमित साहित्यिक गतिविधियों के निरंतर आयोजन की आवश्यकता को रेखांकित किया। इसके साथ ही, वर्तमान इंटरनेट युग में युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और उनमें साहित्य के प्रति रुचि जाग्रत करने की महती आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। अंततः, यह महत्वपूर्ण संगोष्ठी अत्यंत आत्मीय संवाद, गंभीर साहित्यिक विमर्श और राष्ट्र-कल्याण के सामूहिक संकल्प के साथ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।

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