मध्य प्रदेश में कम अंगदान पर धर्म की भूमिका का सवाल, आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
मध्य प्रदेश में अंगदान के आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं। 2023 में देश के 16,542 प्रत्यारोपण में प्रदेश की हिस्सेदारी केवल 1.6% रही। धार्मिक मान्यताओं और अंगदान के बीच संबंध पर अब गंभीर चर्चा जरूरी है।
तस्वीर में मानव हाथ एक लाल दिल के आकार के प्रतीक को थामे हुए दिख रहे हैं, जिसके ऊपर विभिन्न धर्मों के प्रतीक चिह्न और नीचे डॉक्टर अतुल मलिकराम नजर आ रहे हैं। यह तस्वीर काल्पनिक है और एआई द्वारा केवल संदर्भ के लिए बनाई गई है।
मध्य प्रदेश में अंगदान की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मिलकराम ने प्रदेश में कम अंगदान के पीछे धार्मिक धारणाओं की भूमिका पर गंभीर चर्चा की जरूरत बताई है। वर्ष 2023 में देश में कुल 16,542 अंग प्रत्यारोपण हुए, लेकिन मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी महज 1.6 प्रतिशत रही।
स्थिति की गंभीरता कैडेवरिक यानी मृत व्यक्ति के अंगदान के आंकड़ों से भी सामने आती है। जनवरी 2018 से जून 2023 के बीच मध्य प्रदेश में केवल 25 कैडेवरिक अंगदान दर्ज हुए, जबकि इसी अवधि में तेलंगाना में 883 और तमिलनाडु में 713 अंगदान हुए।
इन आंकड़ों के बीच सवाल केवल स्वास्थ्य व्यवस्था तक सीमित नहीं है। ऐसी धारणाएं भी महत्वपूर्ण हैं, जो किसी परिवार को अंतिम क्षण में अंगदान से पीछे हटा देती हैं। क्या अंगदान वास्तव में किसी धर्म के विरुद्ध है? उपलब्ध धार्मिक मार्गदर्शन और सरकारी स्रोतों के अनुसार तस्वीर इससे अलग दिखाई देती है। भारत सरकार के अधीन दिल्ली स्वास्थ्य विभाग भी स्पष्ट करता है कि प्रमुख धर्म अंगदान का विरोध नहीं करते।
हिंदू दर्शन में दान का अर्थ केवल धन देना नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों के कल्याण में योगदान देना है। दान की इसी व्यापक अवधारणा के कारण अंगदान को हिंदू आस्था के साथ संगत माना गया है। हिंदू दृष्टिकोण में आत्मा को शरीर से अलग और मृत्यु को जीवन-चक्र का एक चरण माना जाता है। इसलिए मृत्यु के बाद अंगदान को आत्मा की यात्रा में बाधा मानना धार्मिक रूप से अनिवार्य नहीं है। हिंदू धर्म संबंधी अंगदान मार्गदर्शन भी इसे दूसरों का जीवन बचाने वाली भावना के अनुरूप मानता है। ऋषि दधीचि की कथा इसी संदर्भ में उदाहरण बनती है, जहां उन्होंने लोककल्याण के लिए अपनी अस्थियों तक का त्याग किया।
इस्लाम में अंगदान का प्रश्न अपेक्षाकृत अधिक जटिल है। इसे हर परिस्थिति में एकमत से जायज या नाजायज बताना सही नहीं होगा। इस्लामी विद्वानों के बीच, विशेषकर मृत्यु की चिकित्सकीय परिभाषा और मृत शरीर की गरिमा जैसे प्रश्नों पर अलग-अलग मत रहे हैं। हालांकि अनेक समकालीन इस्लामी विद्वान और संस्थाएं जीवन बचाने के उद्देश्य से अंगदान की अनुमति देती हैं, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। स्वेच्छा, दाता की सुरक्षा, अंगों की खरीद-बिक्री से दूरी और किसी व्यक्ति को नुकसान न पहुंचाने जैसी शर्तें इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए मुस्लिम समाज में यह संदेश होना चाहिए कि अंगदान पर धार्मिक विमर्श मौजूद है, लेकिन इसे केवल धर्म के खिलाफ बताकर खारिज करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।
सिख परंपरा का मूल मंत्र मानवता की सेवा और ‘सरबत दा भला’ की भावना से जुड़ा है। निस्वार्थ सेवा यानी सेवा को सिख जीवन-दर्शन में विशेष स्थान प्राप्त है। इसी कारण अंगदान को किसी जरूरतमंद के जीवन में योगदान के रूप में देखा जा सकता है। सिख धर्म संबंधी आधिकारिक मार्गदर्शन में भी अंगदान पर कोई धार्मिक निषेध नहीं बताया गया है और जीवन बचाने को अत्यंत श्रेष्ठ कार्य माना गया है।
ईसाई धर्म की केंद्रीय शिक्षाओं में प्रेम, करुणा और दूसरों की सहायता प्रमुख हैं। इसी नैतिक आधार पर ईसाई समुदाय में अंगदान को सामान्यतः मानव जीवन की रक्षा और निस्वार्थ प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाता है। शरीर की गरिमा महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन बचाने की भावना भी उतनी ही आवश्यक है।
जैन धर्म का सबसे प्रमुख सिद्धांत अहिंसा है। इसलिए अंगदान के संदर्भ में करुणा और किसी जीव के कष्ट को कम करने की भावना महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। हालांकि जैन परंपरा में शरीर, हिंसा और मृत्यु से जुड़े प्रश्नों को लेकर व्यक्तिगत और धार्मिक दृष्टिकोणों में अंतर संभव है। इसलिए इसे भी एकरूप धार्मिक आदेश के बजाय विवेक और परिस्थितियों से जुड़ा विषय समझना अधिक उचित होगा। व्यापक धार्मिक मार्गदर्शन में जैन धर्म को भी अंगदान के प्रति सकारात्मक परंपराओं वाले धर्मों में रखा गया है।
ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि अंगदान की बड़ी बाधाओं में सही जानकारी की कमी भी शामिल हो सकती है। एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में मृत्यु, अंतिम संस्कार और धार्मिक मान्यताओं को लेकर अनिश्चितता अंगदान के निर्णय को प्रभावित करती है। इसलिए मध्य प्रदेश में अंगदान को केवल स्वास्थ्य विभाग का अभियान मानकर नहीं चलाया जा सकता।
मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, चर्चों और जैन स्थानकों से यदि एक साझा संदेश निकले कि अंगदान जीवन बचाने का संकल्प है, तो इसका सामाजिक प्रभाव कहीं व्यापक देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मृत्यु के बाद हमारे शरीर का कौन-सा अंग हमारे पास रहेगा। सवाल यह होना चाहिए कि हमारे जाने के बाद हमारे कारण कितनी जिंदगियां बच सकती हैं। धर्म मनुष्य के कल्याण का रास्ता दिखाता है और विज्ञान उस कल्याण को संभव बनाने का साधन देता है। मध्य प्रदेश में अंगदान के आंकड़ों को सकारात्मक दिशा में बढ़ाने के लिए इन दोनों को साथ लाने की जरूरत सामने आती है।