SC ने क्यों कहा पवन खेड़ा के मुकदमे को 'राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता'? जाने क्या है पूरा मामला

सर्वोच्च अदालत ने पवन खेड़ा के खिलाफ दर्ज FIR को प्रथम दृष्टया राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम मानते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। पढ़े पूरा रिपोर्ट

Update: 2026-05-01 07:19 GMT

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा नई दिल्ली में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए, जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मिल गई है।

Pawan Khera anticipatory bail Supreme Court : भारतीय राजनीति के गलियारों में छिड़ी कानूनी जंग के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा को देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ी राहत मिली है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइंया सरमा को लेकर की गई बयानबाजी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 1 मई 2026 को पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत मंजूर कर ली। शीर्ष अदालत ने इस पूरे प्रकरण को प्रथम दृष्टया राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम मानते हुए खेड़ा को पुलिस हिरासत में लिए जाने की आवश्यकता को खारिज कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब असम पुलिस और पवन खेड़ा के बीच कानूनी रस्साकशी अपने चरम पर थी।

पूरे विवाद की जड़ असम के मुख्यमंत्री की पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई वह प्राथमिकी है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनके खिलाफ फर्जी पासपोर्ट और संपत्ति के झूठे दस्तावेज पेश किए थे। इस शिकायत के आधार पर गुवाहाटी में मामला दर्ज किया गया, जिसके बाद खेड़ा ने अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। गुवाहाटी हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। खेड़ा की दलील थी कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयानों से स्पष्ट है कि उन्हें केवल अपमानित करने और राजनीतिक प्रतिशोध के चलते हिरासत में लेने की कोशिश की जा रही है।

न्यायमूर्ति जेके महेश्वरी और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने मामले की गंभीरता को परखते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखते हुए यह आरोप राजनीतिक रूप से प्रेरित और आपसी प्रतिद्वंद्विता से प्रभावित प्रतीत होते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान स्थिति ऐसी नहीं है जिसमें आरोपी को पूछताछ के लिए हिरासत में लेना अनिवार्य हो। साथ ही अदालत ने यह भी जोड़ा कि आरोपों की सत्यता और दस्तावेजों की प्रमाणिकता की जांच ट्रायल यानी मुकदमे के दौरान की जा सकती है, लेकिन इसके लिए स्वतंत्रता का हनन उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने लिखित आदेश में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा पवन खेड़ा के खिलाफ दिए गए सार्वजनिक बयानों को भी दर्ज किया है। कोर्ट ने इन बयानों को इस निष्कर्ष का आधार बनाया कि यह पूरा मामला राजनीतिक द्वेष की ओर इशारा करता है। हालांकि, राहत देने के साथ-साथ कोर्ट ने पवन खेड़ा को जांच में पूरी तरह सहयोग करने का निर्देश भी दिया है। शीर्ष अदालत का यह हस्तक्षेप न केवल पवन खेड़ा के लिए व्यक्तिगत जीत है, बल्कि यह राजनीतिक विवादों में कानूनी मशीनरी के इस्तेमाल की सीमाओं को भी रेखांकित करता है, जो आने वाले समय में राजनीतिक बयानबाजी और कानूनी कार्रवाइयों के बीच एक महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा।

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