अस्पताल के बिस्तर पर लेटे मरीज की जांच करते डॉक्टर का दृश्य जो स्वास्थ्य बीमा में ओपीडी शामिल करने की सिफारिश को दर्शाता है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है, जो सीधे तौर पर आम नागरिकों और मरीजों के जीवन को प्रभावित करेगी。 देश के निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों को आमतौर पर तभी स्वास्थ्य बीमा या इंश्योरेंस के पैसों का भुगतान मिल पाता है जब उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाता है या फिर वे आईसीयू में दाखिल होते हैं。 इसके अलावा भी इन दावों के साथ कई प्रकार की जटिल शर्तें जुड़ी होती हैं, जिससे आम आदमी को पूरी राहत नहीं मिल पाती है。 इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए अब केंद्र सरकार की एक संसदीय समिति ने स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के दायरे में एक क्रांतिकारी विस्तार करने की सिफारिश की है。 समिति ने अपनी इस सिफारिश के तहत स्वास्थ्य बीमा में ओपीडी यानी आउट पेशेंट डिपार्टमेंट के खर्चों को भी शामिल करने की जोरदार वकालत की है, जिससे मरीजों को आने वाले समय में बड़ी राहत मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है。

संसदीय समिति द्वारा की गई इस प्रमुख सिफारिश के अनुसार स्वास्थ्य बीमा के दायरे को केवल अस्पताल में भर्ती होने तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे ओपीडी इलाज के दायरे तक पूरी तरह से बढ़ाया जाना चाहिए。 इस सिलसिले में समिति ने भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण यानी आईआरडीएआई को यह निर्देश दिया है कि वे मानक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में व्यापक ओपीडी कवरेज को अनिवार्य रूप से लागू करें。 इस नई और व्यापक सिफारिश में पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए नियमित चिकित्सा जांच, विभिन्न प्रकार की आवश्यक दवाओं और विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श यानी डॉक्टर की फीस के खर्च को भी पूरी तरह से शामिल करने की बात कही गई है。

विभिन्न रिपोर्ट्स के आंकड़ों के मुताबिक देश में जब कोई आम नागरिक ओपीडी में एक बार इलाज कराता है तो उसे अपनी जेब से औसतन 861 रुपये तक का खर्च वहन करना पड़ता है। समिति ने इस बात पर विशेष प्रकाश डाला है कि मधुमेह यानी डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों के मामलों में मरीजों को बार-बार डॉक्टर के पास जाना पड़ता है और नियमित रूप से अपनी जांच तथा दवाइयां करानी होती हैं। यही कारण है कि स्वास्थ्य बीमा का लाभ केवल अस्पताल में भर्ती होने तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि ओपीडी में होने वाले रोजमर्रा के खर्चों को भी इसके अंतर्गत शामिल किया जाना निहायत जरूरी है ताकि मरीजों के छोटे-छोटे खर्चों की भी प्रभावी बचत हो सके।

इस पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए संसदीय समिति ने एक और बेहद अहम और कड़ा सुझाव दिया है। समिति की सिफारिश के अनुसार देश के सभी अस्पतालों को अपनी पूरी शुल्क सूची यानी रेट लिस्ट को सार्वजनिक करना होगा ताकि मरीजों को इसकी पूरी जानकारी मिल सके। किसी भी मरीज को अस्पताल में भर्ती किए जाने से पहले या उसका इलाज शुरू होने से पूर्व इस बात की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए कि चिकित्सा की किस विशिष्ट सेवा के लिए अस्पताल द्वारा कितना शुल्क लिया जाएगा। समिति का मानना है कि इस प्रकार की एक पारदर्शी शुल्क व्यवस्था लागू होने से छिपे हुए शुल्कों यानी हिडन चार्जेस और मरीजों पर थोपी जाने वाली अनावश्यक जांच जैसी गंभीर समस्याओं पर प्रभावी ढंग से रोक लगाने में काफी मदद मिलेगी।