करोड़ों जगन्नाथ भक्तों की भावनाओं की हुई जीत; दीघा मंदिर के आगे से हटा 'धाम', आदि शंकराचार्य की स्थापित मर्यादा रही अक्षुण्ण
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने ओडिशा सरकार की आपत्ति के बाद बदला ममता बनर्जी का फैसला; अब 'सांस्कृतिक केंद्र' कहलाएगा परिसर।
दीघा जगन्नाथ मंदिर (बाएं) और पोडियम पर वक्तव्य देते सीएम शुभेंदु अधिकारी (दाएं), जिनका चित्र 'धाम' शब्द हटाने के कैबिनेट फैसले के संदर्भ में है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के दीघा में नवनिर्मित भगवान जगन्नाथ मंदिर परिसर को लेकर लंबे समय से चला आ रहा नामकरण का विवाद समाप्त हो गया है। राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक बड़ा नीतिगत निर्णय लेते हुए इस परिसर के नाम से 'धाम' शब्द को पूरी तरह हटाने की घोषणा की है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब इस पूरे परिसर को आधिकारिक रूप से 'श्रीश्री जगन्नाथ सांस्कृतिक केंद्र' के नाम से संबोधित किया जाएगा, जबकि मुख्य पूजा स्थल को 'श्री जगन्नाथ देव मंदिर' कहा जाएगा। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार द्वारा पिछले वर्ष अप्रैल में इस महत्वाकांक्षी परियोजना का उद्घाटन किया गया था, जिसके बाद से ही इसके नाम में 'धाम' शब्द जोड़ने पर भारी धार्मिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था। वर्तमान सरकार ने इस कदम को सनातन परंपराओं की रक्षा की दिशा में उठाया गया एक आवश्यक सुधार बताया है।
इस प्रशासनिक और धार्मिक बदलाव के पीछे के मुख्य घटनाक्रम को साझा करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि पुरी से नवनिर्वाचित भाजपा सांसद संबित पात्रा ने कोलकाता आकर उनसे मुलाकात की थी। संबित पात्रा इस दौरान ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी का एक आधिकारिक प्रस्ताव पत्र लेकर एक विशेष प्रतिनिधि के रूप में आए थे। इस पत्र में ओडिशा सरकार और वहां के निवासियों की उन धार्मिक आपत्तियों को दर्ज किया गया था, जो दीघा मंदिर के साथ 'धाम' शब्द के इस्तेमाल से उत्पन्न हो रही थीं। बंगाल की नवनिर्वाचित कैबिनेट ने इस संवेदनशील विषय की गंभीरता को समझते हुए नाम में परिवर्तन करने के प्रस्ताव को तत्काल और सर्वसम्मति से अपनी मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही, इस परियोजना से जुड़े हुडको (HIDCO) टेंडर और अन्य सरकारी फंड्स के विधिक प्रावधानों को भी नए नामकरण के अनुरूप संशोधित करने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं।
इस पूरे मामले के तकनीकी और दस्तावेजी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जब उन्होंने पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार के कैबिनेट प्रस्ताव और निर्माण कार्य के लिए जारी किए गए मूल निविदा (टेंडर) नोटिस की समीक्षा की, तो पाया कि मूल रूप से इस पूरी परियोजना को केवल एक 'सांस्कृतिक केंद्र' के रूप में ही स्वीकृति दी गई थी। मूल विधिक दस्तावेजों में कहीं भी 'धाम' शब्द का कोई वित्तीय या प्रशासनिक प्रावधान नहीं था, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि इस शब्द को बाद में केवल राजनीतिक लाभ के लिए जोड़ा गया था। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि सनातन परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पवित्र धामों में से एक ओडिशा का 'जगन्नाथ पुरी धाम' है, जहां भगवान नारायण साक्षात निवास करते हैं। ऐसे में किसी नए निर्मित ढांचे के आगे 'धाम' शब्द जोड़ना न केवल साढ़े चार करोड़ ओडिया जनता की आस्था के खिलाफ था, बल्कि बंगाल के अनगिनत सनातनी भक्तों की पारंपरिक भावनाओं का भी बड़ा अपमान था।
इस फैसले के विधिक क्रियान्वयन के लिए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने राज्य के मुख्य सचिव को आवश्यक सरकारी अधिसूचना जारी करने का कड़ा निर्देश दे दिया है। साथ ही, इस परिसर का प्रशासनिक संचालन और प्रबंधन करने वाले आधिकारिक ट्रस्ट को भी इस महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव के बारे में विधिवत रूप से सूचित कर दिया गया है। गौरतलब है कि ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने 6 मई 2025 को पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक विस्तृत पत्र लिखकर आगाह किया था कि दीघा के मंदिर के लिए 'धाम' शब्द का प्रयोग करने से पुरी के विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत कमजोर होती है। इसके अतिरिक्त, श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष गजपति महाराज दिब्यसिंह देब ने भी मंदिर का संचालन संभालने वाली संस्था इस्कॉन (ISKCON) से अपील की थी कि वे स्थापित धार्मिक नियमों और सदियों पुरानी शास्त्रीय परंपराओं के उल्लंघन को रोकने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाएं।
दीघा जगन्नाथ मंदिर के मुख्य पुजारी और न्यासी राधारमण दास ने राज्य सरकार के इस नए फैसले का पुरजोर स्वागत किया है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री ने इस संवेदनशील धार्मिक विषय पर मायापुर स्थित इस्कॉन मंदिर के दौरे के समय उनसे व्यक्तिगत रूप से और विस्तार से चर्चा की थी। मंदिर प्रशासन इस बात से बेहद संतुष्ट है कि अब पारंपरिक सात्विक नियमों और शास्त्रों में वर्णित पद्धतियों के अनुसार ही यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की दैनिक पूजा-अर्चना संपन्न की जाएगी। मंदिर परिसर में आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद वितरण की सुचारू व्यवस्था रहेगी और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए ट्रस्ट समिति के सभी सदस्यों की विधिक जानकारी मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक की जाएगी। इस कूटनीतिक और धार्मिक सुधार ने दोनों पड़ोसी राज्यों के बीच बने अनावश्यक सांस्कृतिक तनाव को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है।