विको ब्रांड सक्सेस स्टोरी: चॉल से शुरू हुए ब्रांड ने लिखी करोड़ों की सफलता की कहानी, संगीता बिजलानी का ऐड हुआ था सुपरहिट|
साल 1952 में बॉम्बे की एक चॉल से शुरू हुआ विको ब्रांड आज आयुर्वेदिक उत्पादों और शानदार मार्केटिंग के दम पर करोड़ों का टर्नओवर बना चुका है।
विको टरमरिक क्रीम के उत्पाद और विज्ञापन में नजर आईं संगीता बिजलानी का कोलाज।
भारत की ब्यूटी इंडस्ट्री में विको (Vicco) की कहानी एक मील का पत्थर है। वर्ष 1952 में बॉम्बे (अब मुंबई) की एक साधारण चॉल से शुरू हुआ यह सफर आज भारतीय जड़ों, आयुर्वेद और इनोवेटिव मार्केटिंग का एक बेजोड़ उदाहरण बन चुका है। उस दौर में जब देश के बाजार में केमिकल-युक्त सौंदर्य प्रसाधनों की भरमार थी, तब विको ने 'हल्दी' के पारंपरिक गुणों और 'विको टरमरिक नहीं कॉस्मेटिक...' जैसे प्रसिद्ध जिंगल के दम पर हर भारतीय परिवार में अपनी खास पहचान बनाई।
1952 में चॉल से हुई थी शुरुआत
साल 1952 में केवी पेंढारकर ने 'विष्णु इंडस्ट्रियल केमिकल कंपनी' (VICCO) की नींव रखी थी। बॉम्बे की एक चॉल से बेहद मामूली शुरुआत करने वाली यह कंपनी आगे चलकर देश की सबसे बड़ी आयुर्वेदिक कंपनियों में शामिल हुई। 18 दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित आयुर्वेदिक टूथपेस्ट 'विको वज्रदंती' के बाद कंपनी ने भारतीय महिलाओं की त्वचा की जरूरतों को देखते हुए 'विको टरमरिक आयुर्वेदिक क्रीम' बाजार में उतारी।
उस दौर में देश की अधिकांश आबादी निखरी त्वचा के लिए स्थानीय 'स्नो क्रीम' पर निर्भर थी और हल्दी के पीले रंग को चेहरे पर लगाने से हिचकिचाती थी। इस हिचकिचाहट को दूर करने के लिए विको के सेल्समेन खुद खुदरा विक्रेताओं (रिटेलर्स) के चेहरे पर क्रीम लगाते थे और उन्हें आईना दिखाकर उत्पाद की गुणवत्ता पर भरोसा दिलाते थे।
संगीता बिजलानी का विज्ञापन और टीवी स्पॉन्सरशिप
80 और 90 के दशक में विको ने भारतीय विज्ञापन जगत की रूपरेखा बदल दी। जाने-माने निर्माता एसएस ओबेरॉय के साथ मिलकर तैयार किया गया 77 सेकंड का एक कमर्शियल दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो पर बेहद लोकप्रिय हुआ। इस विज्ञापन में पूर्व मिस इंडिया संगीता बिजलानी होने वाली दुल्हन के रूप में नजर आई थीं। शादी में हल्दी के सांस्कृतिक महत्व को जोड़ते हुए तैयार किया गया जिंगल 'विको टरमरिक नहीं कॉस्मेटिक...' घर-घर में गूंजने लगा।
इसके अलावा, विको लैबोरेटरीज के अध्यक्ष गजानन पेंढारकर ने लोकप्रिय सिटकॉम 'ये जो है जिंदगी' जैसे धारावाहिकों को स्पॉन्सर करके भारत में 'प्राइम-टाइम टीवी स्पॉन्सरशिप' और वीसीआर (VCR) कैसेट विज्ञापनों की मजबूत नींव रखी।
कानूनी लड़ाई को बनाया मार्केटिंग का हथियार
विको की सफलता का सबसे दिलचस्प पहलू 1978 का एक कानूनी विवाद रहा। सेंट्रल एक्साइज डिपार्टमेंट ने विको वज्रदंती और विको टरमरिक को आयुर्वेदिक औषधि मानने से इंकार करते हुए 'कॉस्मेटिक' की श्रेणी में डाल दिया था। इसके खिलाफ विको ने अदालत का रुख किया। साल 1982 में सिविल कोर्ट ने विको के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इन उत्पादों को आयुर्वेदिक माना, कॉस्मेटिक नहीं।
कंपनी ने इस कानूनी जीत को अपनी मार्केटिंग रणनीति का सबसे बड़ा हथियार बना लिया। विको ने 'विको टरमरिक नहीं कॉस्मेटिक, विको टरमरिक आयुर्वेदिक क्रीम' का स्लोगन देकर खुद को एक शुद्ध और सुरक्षित आयुर्वेदिक ब्रांड के रूप में स्थापित कर दिया।
आज 400 करोड़ का टर्नओवर और 35 देशों में निर्यात
एचयूएल, डाबर और हिमालया जैसी दिग्गज कंपनियों की कड़ी प्रतिस्पर्धा और बदलती प्राथमिकताओं के बीच भी विको ने अपनी पहचान बनाए रखी। आज लगभग 400 करोड़ रुपये के टर्नओवर के साथ यह पूरी तरह से एक पारिवारिक व्यवसाय के रूप में संचालित हो रहा है। विको के उत्पाद अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूएई सहित 35 से अधिक अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात किए जाते हैं।
आधुनिक समय के साथ तालमेल बिठाने के लिए कंपनी ने फोम बेस क्रीम, शेविंग क्रीम, सनस्क्रीन और फेस वॉश जैसे नए उत्पाद पेश किए हैं। इसके साथ ही, इंस्टाग्राम पर #NoFilter चैलेंज और सोहा अली खान जैसी हस्तियों के साथ इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के जरिए विको आज की युवा पीढ़ी के बीच भी अपनी पहचान बनाए हुए है।