संजय कच्छप: मालाएं बेचकर मनाई दिवाली, अब झारखंड के 50+ गांवों में जलाई डिजिटल लाइब्रेरी की अलख
चाईबासा में गेंदे के फूल बेचकर दिवाली मनाने वाले संजय कच्छप झारखंड डिजिटल लाइब्रेरी ग्रुप के माध्यम से ग्रामीण बच्चों को किताबें, कंप्यूटर और बेहतर अध्ययन माहौल दे रहे हैं।
झारखंड डिजिटल लाइब्रेरी ग्रुप से जुड़कर ग्रामीण बच्चे शिक्षा और बेहतर भविष्य की दिशा तय कर रहे हैं।
जमशेदपुर। कभी घर की कियारी में खिले गेंदे के फूलों की मालाएं बेचकर दिवाली मनाने वाले संजय कच्छप आज झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। बचपन में आर्थिक तंगी के बीच महज 150 रुपये जुटाकर परिवार की दिवाली रोशन करने वाले संजय ने अब दूसरों के भविष्य को संवारने का संकल्प लिया है। झारखंड डिजिटल लाइब्रेरी ग्रुप के संस्थापक के रूप में उनकी पहल से राज्य के 50 से अधिक गांवों में डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की जा चुकी हैं। उनका प्रयास है कि ग्रामीण बच्चों को किताबों, कंप्यूटर और अध्ययन के लिए बेहतर वातावरण उपलब्ध हो, ताकि आर्थिक अभाव उनकी शिक्षा और सपनों के रास्ते में बाधा न बने।
संजय कच्छप के बचपन की दिवाली आज भी संघर्ष और आत्मनिर्भरता की एक भावुक याद के रूप में उनके साथ है। उन्होंने प्रभात खबर को अपने बचपन के दिन याद करते हुए बताया कि दिवाली के दौरान बाजारों में रौनक रहती थी, लेकिन उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पिता को प्रतिदिन मजदूरी नहीं मिलती थी और मां धान की कटाई के लिए चक्रधरपुर गई हुई थीं। मां की कमाई भी घर के राशन पर खर्च हो चुकी थी। उस समय चावल ही परिवार का मुख्य भोजन था। दिवाली नजदीक थी, लेकिन त्योहार मनाने के लिए घर में पैसे नहीं थे।
ऐसे कठिन समय में घर के बागान की छोटी-सी कियारी में खिले गेंदे के फूल परिवार की दिवाली मनाने का सहारा बने। संजय ने अपने छोटे भाई के साथ मिलकर सुई-धागे से फूलों की मालाएं तैयार कीं और उन्हें बेचने के लिए चाईबासा के जैन मार्केट चौक पहुंच गए। उनकी मालाएं हाथों-हाथ बिक गईं और करीब 150 रुपये मिले। उस समय यह रकम उनके लिए बहुत बड़ी थी। मां ने इन्हीं पैसों से पूजा के दीये, गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति और प्रसाद खरीदा।
संजय बताते हैं कि दिवाली की शाम उनके पिता गैराज से जला हुआ मोबिल लेकर आए थे। घर के अंदर कुछ दीये सरसों के तेल से जलाए गए, जबकि बाहर जले हुए मोबिल से रोशनी की गई। छोटे भाई ने आंगन में सुंदर कुंडा बनाया था। घर में न पटाखे थे और न मिठाइयां, लेकिन परिवार अपनी छोटी-सी दुनिया में खुश था। आर्थिक अभावों के बीच मनाई गई वह दिवाली आज भी उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यादों में शामिल है।
बचपन में आर्थिक तंगी के कारण त्योहार मनाने के लिए किए गए संघर्ष ने संजय कच्छप को शिक्षा और अवसरों का महत्व समझाया। यही अनुभव आगे चलकर उनके सामाजिक प्रयासों की प्रेरणा बना। आज सरकारी पद पर रहते हुए भी वे समय निकालकर बच्चों और युवाओं को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते हैं। झारखंड डिजिटल लाइब्रेरी ग्रुप के माध्यम से ग्रामीणों के सहयोग से राज्य के सुदूर गांवों में 50 से अधिक डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
संजय समय मिलने पर अलग-अलग गांवों की लाइब्रेरियों में पहुंचते हैं और बच्चों को शिक्षा के महत्व के बारे में बताते हैं। इसके साथ ही लाइब्रेरियों में कुर्सी-टेबल, किताबें, कंप्यूटर और रोशनी की व्यवस्था कराने में भी सहयोग करते हैं। उनका उद्देश्य है कि संसाधनों की कमी के कारण किसी बच्चे की पढ़ाई प्रभावित न हो। उनकी कोशिश उन बस्तियों में भी बदलाव लाने की है, जहां कभी जुए और नशे के अड्डे हुआ करते थे। अब वे चाहते हैं कि ऐसे स्थानों पर पुस्तकालय और ज्ञान केंद्र विकसित हों, जहां बच्चे पढ़ाई के साथ अपने भविष्य की दिशा तय कर सकें।
संजय कच्छप के लिए दिवाली का अर्थ अब केवल अपने घर को दीयों से रोशन करना नहीं रह गया है, बल्कि दूसरों के जीवन में शिक्षा और अवसरों की रोशनी पहुंचाना भी है। कभी फूलों की मालाएं बेचकर करीब 150 रुपये जुटाने वाले संजय आज चाहते हैं कि गांव का कोई बच्चा सिर्फ किताब, कंप्यूटर या पढ़ने के लिए उचित स्थान की कमी के कारण पीछे न रह जाए। उनके प्रयासों से 50 से अधिक गांवों में विकसित हो रही डिजिटल लाइब्रेरी ग्रामीण बच्चों के लिए शिक्षा के नए केंद्र बन रही हैं। अभावों के बीच बीती बचपन की दिवाली से निकला उनका संकल्प अब झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बच्चों के भविष्य को नई दिशा देने का माध्यम बन रहा है।