तीन दशक क चला मुकदमा, 2026 में सुनाई गई सजा ; बिहार के 85 वर्षीय दीप राय को हुई 3 साल की जेल
बिहार के वैशाली जिले में 1992 के हत्या के प्रयास और जानलेवा हमले के 34 साल पुराने मामले में अदालत ने पांच दोषियों को सजा सुनाई है। 85 वर्षीय दीप राय को तीन साल और चार अन्य दोषियों को 10-10 साल की जेल हुई। फैसले के बाद वायरल हुए वीडियो ने न्यायिक देरी और लंबित मामलों पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी।
वैशाली में 34 साल बाद हत्या के प्रयास के मामले में पांच दोषी करार
न्याय में देरी को लेकर अक्सर उठने वाले सवालों के बीच बिहार के वैशाली जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। करीब 34 वर्षों तक अदालतों में चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार एक पुराने जानलेवा हमले के मामले में फैसला सुनाया गया। इस फैसले की सबसे चर्चित तस्वीर एक 85 वर्षीय बुजुर्ग की रही, जो अदालत परिसर से लाठी और चप्पल के सहारे बाहर निकलता दिखाई दिया। इस दृश्य का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी को लेकर नई बहस छेड़ दी।
वैशाली जिले की एक अदालत ने वर्ष 1992 के एक हत्या के प्रयास और जानलेवा हमले के मामले में एक ही परिवार के पांच लोगों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी की अदालत ने तीन दशक से अधिक समय तक चले मुकदमे के बाद यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार यह घटना वर्ष 1992 में वैशाली जिले के जुरावनपुर-राघोपुर क्षेत्र में हुई थी। शिकायतकर्ता अदालत राय ने आरोप लगाया था कि वह अपनी पत्नी रामसखी देवी के साथ घर के बाहर बैठे थे, तभी पड़ोस के एक परिवार के सदस्य हथियारों के साथ वहां पहुंचे। बताया गया कि दोनों परिवारों के बीच घर के पास स्थित एक रास्ते को लेकर विवाद चल रहा था। विरोध करने पर आरोपियों ने कथित तौर पर दंपति पर हमला कर दिया और गोलीबारी की, जिससे दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए।
मामले में दीप राय, जगदीश राय, नरेश राय, नागदेव राय और नकेश्वर राय को दोषी ठहराया गया। अदालत ने उन्हें दंगा करने, हत्या के प्रयास तथा शस्त्र अधिनियम से संबंधित धाराओं के तहत दोषी पाया। इनमें सबसे अधिक चर्चा 84-85 वर्षीय दीपा राय की हो रही है, जिनकी उम्र और स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए अदालत ने अलग सजा निर्धारित की।
इस मामले की सबसे हैरान करने वाली बात इसका लंबा न्यायिक सफर रहा। घटना के बाद वर्ष 1992 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जबकि पुलिस ने 1993 में आरोपपत्र दाखिल किया। इसके बावजूद आरोपों का औपचारिक गठन 1999 में हो सका। इसके बाद मुकदमा वर्षों तक विभिन्न कानूनी प्रक्रियाओं में उलझा रहा। इस दौरान मामले से जुड़े चार आरोपी दुनिया छोड़ चुके थे और अंततः फैसला सुनाए जाने तक केवल वृद्ध दीपा राय ही अदालत के समक्ष मौजूद रहे।
अदालत ने चार दोषियों को 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। वहीं 85 वर्षीय दीपा राय को उनकी उन्नत आयु को ध्यान में रखते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। इसके अतिरिक्त सभी पांच दोषियों पर 25-25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। हालांकि सजा सुनाए जाने के बाद अदालत ने दीप राय को उनकी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए अंतरिम राहत प्रदान की। उन्हें अंतरिम जमानत दी गई ताकि वे उच्च न्यायालय में फैसले को चुनौती देने का कानूनी अधिकार प्रयोग कर सकें।
फैसले के बाद अदालत परिसर से बाहर निकलते हुए दीपा राय का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में वह कमजोर अवस्था में लाठी के सहारे चलते दिखाई दे रहे थे। इस दृश्य ने लोगों के बीच यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया कि क्या तीन दशक से अधिक समय बाद मिला न्याय वास्तव में समय पर मिला न्याय माना जा सकता है। बताया गया कि इस वायरल वीडियो ने न्यायपालिका के उच्च स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया और कुछ समय के लिए इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की चर्चा भी हुई। बाद में यह स्पष्ट हुआ कि बुजुर्ग दोषी को पहले ही अंतरिम जमानत प्रदान की जा चुकी है।
यह मामला केवल एक आपराधिक मुकदमे का फैसला भर नहीं है, बल्कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों की गंभीर चुनौती का भी प्रतीक बन गया है। 34 वर्षों बाद आए इस निर्णय ने एक ओर पीड़ित पक्ष को न्याय की अनुभूति दी है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रियाओं में होने वाली असाधारण देरी को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। यह मामला आने वाले समय में न्यायिक सुधारों और मामलों के त्वरित निपटारे की आवश्यकता पर चर्चा का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।