International Men's Day : भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ने के दावों के बीच एक गहरी और मौन आपात स्थिति आकार ले रही है, जो हर वर्ष हजारों लोगों की जान ले रही है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015–16 के अनुसार देश की लगभग 14 प्रतिशत आबादी किसी न किसी मानसिक विकार से जूझ रही है, लेकिन उपचार तक पहुंच अत्यंत सीमित है। प्रत्येक दस में से केवल एक व्यक्ति को ही आवश्यक चिकित्सा सहायता मिल पाती है। चिंताजनक तथ्य यह है कि इस संकट का सबसे बड़ा दंश पुरुष झेल रहे हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पुरुषों में आत्महत्या की घटनाएं महिलाओं की तुलना में 2.6 गुना अधिक हैं। वर्ष 2021 में जहां 45,026 महिलाओं ने आत्महत्या की, वहीं पुरुषों की संख्या 1,18,979 दर्ज की गई। विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां महिलाएं मानसिक विकारों को भीतर समेट कर झेलती हैं, वहीं पुरुष अक्सर इन्हें बाहरी रूपों नशे, आक्रामकता और हिंसा के माध्यम से प्रकट करते हैं। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी आम चर्चाओं में लंबे समय तक महिलाओं की समस्याओं को उचित प्राथमिकता दी गई, पर पुरुषों के भीतर उभरते दबाव और संकट को समान गंभीरता नहीं मिली।

दिल्ली और विजयवाड़ा की मलिन बस्तियों में किए गए ‘आर्टेमिस’ अध्ययन ने यह स्पष्ट किया कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पैटर्न किशोरों में बेहद कम उम्र से ही विकसित हो जाते हैं। कई किशोर सामाजिक उपहास, साथी समूह के दबाव और कलंक के कारण मानसिक स्वास्थ्य सहायता लेने से बचते हैं। एक किशोर ने यह स्वीकार किया कि उसने आत्मघाती कदम उठाने का प्रयास किया था, लेकिन समय पर मिली सलाह ने उसकी जान बचाई। अध्ययन दर्शाता है कि भावनाओं को दबाने का संस्कार किसी जन्मजात प्रवृत्ति से नहीं बल्कि वातावरण, सामाजिक अपेक्षाओं और पारिवारिक दबाव से विकसित होता है। यही दबाव आगे वयस्कता में और गहराई से पुरुषों को प्रभावित करता है।

चित्र और भी गंभीर तब हो जाता है जब ग्रामीण क्षेत्रों के आंकड़े सामने आते हैं। आंध्र प्रदेश और हरियाणा में संचालित स्मार्ट मेंटल हेल्थ (एसएमएच) परियोजना ने वयस्क पुरुषों की मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में आने वाली कठिनाइयों को रेखांकित किया। कई पुरुषों ने बताया कि वे उपचार इसलिए नहीं लेते क्योंकि समाज में इसका मजाक बनाया जाता है, गोपनीयता की कोई गारंटी नहीं और अक्सर उन्हें यह भी पता नहीं होता कि किस चिकित्सक या केंद्र से मदद लेनी चाहिए। कुछ ने शिकायत की कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में उन्हें एक विभाग से दूसरे विभाग में भेजा जाता है, जबकि वास्तविक उपचार तक पहुंच बेहद कठिन बनी रहती है।

संकट का सबसे भयावह पहलू दिहाड़ी मजदूरों के आंकड़ों में दिखाई देता है। आर्थिक अस्थिरता, असंगठित रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण इस वर्ग में आत्महत्या की दर 2014 से 2021 के बीच 170 प्रतिशत से अधिक बढ़ी। यह वृद्धि सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे की गंभीर कमजोरियों को उजागर करती है।

नीतिगत स्तर पर विशेषज्ञों की राय है कि भारत को ऐसी योजनाओं और सामाजिक हस्तक्षेपों की जरूरत है जो पुरुषों को लैंगिक समानता पर होने वाली चर्चाओं का हिस्सा बनाएं, न कि विरोधी पक्ष। इससे पुरुषत्व की अधिक संतुलित, संवेदनशील और स्वस्थ अभिव्यक्ति को बढ़ावा मिलेगा और मानसिक स्वास्थ्य को ‘कमजोरी’ मानने की रूढ़िवादी सोच टूट सकेगी।

भारत के सामने अब यह स्पष्ट चुनौती खड़ी है कि पुरुषों का मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसा संकट बन गया है, जिसे अनदेखा करना संभव नहीं। यह केवल सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक तात्कालिक प्राथमिकता है, जिस पर तत्काल और ठोस कदम आवश्यक हो चुके हैं।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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