भारत ने असंभव को संभव कर दिखाया

एक धरती, एक परिवार और एक भविष्य के लक्ष्य को ध्यान में रख भारत ने खेमों में बंटी दुनिया को एक कुटुंब के रूप में जोड़ने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की....

Pratahkal    16-Sep-2023
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शिवकांत शर्मा... भारत (India) ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) के नेतृत्व में वह हासिल कर दिखाया जिसे भूराजनीतिक संकटों के समाधान के लिए बने अंतरराष्ट्रीय मंच हासिल नहीं कर पा रहे थे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यूक्रेन युद्ध (Ukraine war) को रूकवाने के लिए कुछ नहीं कर पा रही और आमसभा जैसे मंचों के प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित न हो पाने के कारण निष्प्रभावी रहे । इसीलिए भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में संपन्न जी-20 (G-20) शिखर सम्मेलन के कुछ दिन पहले तक किसी को उम्मीद नहीं थी कि घोषणा पत्र पर सहमति बन पाएगी।
 
चीनी राष्ट्रपति के इस सम्मेलन में न आने का अर्थ यह लगाया गया था कि चीन की मंशा भारत का खेल बिगाड़ने की है, परंतु भारतीय राजनयिकों के कौशल और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भारत के बढ़ते कद ने असंभव को संभव कर दिखाया। शिखर सम्मेलन के पहले दिन ही घोषणा पत्र पर आम सहमति जुटा कर भारत ने सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की अपनी दावेदारी को भी मजबूत किया। इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन (US President Biden) ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई द्विपक्षीय शिखर वार्ता में भारत की इस दावेदारी के समर्थन को दोहराया।
 
घोषणा पत्र में रूस (Russia) का नाम न लेते हुए यूक्रेन में जारी युद्ध से हो रही मानवीय यातना और वैश्विक खाद्य एवं ऊर्जा संकट पर चिंता व्यक्त की गई। इस पर जोर दिया गया कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मुताबिक सभी देशों को किसी अन्य देश की क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरूद्ध धमकी या बलप्रयोग से बचना चाहिए। साथ ही परमाणु हथियारों के प्रयोग या प्रयोग की धमकी को भी अस्वीकार किया गया।
 
यूक्रेन और यूरोप के देश 'यूक्रेन में युद्ध हो रहा' कहने और हमलावर का नाम न लेने से नाखुश हैं, परंतु यूक्रेन युद्ध के बाद से
अमेरिका (America) और नाटो (Nato) और रूस एवं चीन के बीच बढ़ते तनाव के माहौल में नाम लिए बिना भी ऐसे घोषणा पत्र पर रूस और चीन की सहमति जुटाना किसी ऐतिहासिक उपलब्धि से कम नहीं। इस घोषणा पत्र से यूक्रेन युद्ध में तो किसी बदलाव के आसार नहीं, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में यह संदेश अवश्य गया कि यदि कोई देश रूस को समाधान के लिए तैयार कर सकता है तो वह शायद भारत ही होगा।
 
55 देशों के संगठन अफ्रीकी संघ को जी -20 की सदस्यता दिलाकर इसे जी-21 में बदल देना भी भावी विकास और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दृष्टि से भारत की बड़ी उपलब्धि है। अफ्रीकी संघ के सदस्य बनने से जी-20 में दक्षिणी देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। अभी तक वहां जी - 7 देशों, यूरोपीय संघ के 25 देशों, रूस, चीन और तुर्किए को मिलाकर उत्तर का पलड़ा भारी था। अफ्रीकी देशों की सदस्यता के बाद दक्षिणी देशों की संख्या बढ़ जाएगी। वैसे चीन और रूस दोनों अफ्रीकी देशों को सदस्यता दिलाने का श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं।
 
चीन ने पिछले दो-तीन दशकों से अफ्रीकी देशों में भारी निवेश किया है और रूस भी निवेश के साथ-साथ राजनीतिक उठापटक कराने में लगा रहता है, पर चीनी निवेश से अफ्रीकी देशों में कर्ज संकट पैदा हुआ है और रूस के भाड़े के सैनिक अफ्रीकी देशों में विद्रोह करा रहे हैं। भारत के अफ्रीका (Africa) से हजारों साल पुराने व्यापारिक और सामाजिक रिश्ते हैं। भारत (India) का स्वाधीनता आंदोलन अफ्रीकी देशों के स्वाधीनता आंदोलनों का प्रेरणास्रोत बना। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व करते हुए भारत हमेशा दक्षिणी देशों की आवाज बुलंद करता आया है। इसलिए अफ्रीकी संघ को उत्तर और दक्षिण के साझा मंच जी-20 की सदस्यता दिलाने से भारत को स्वाभाविक रूप से दक्षिण की आवाज बनने में मदद मिलेगी ।
 
भारत केंद्रित विकास की दृष्टि से देखें तो देश को पश्चिमी एशिया से होकर यूरोप के साथ जोड़ने वाले परिवहन और ऊर्जा गलियारे की परियोजना इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है। हालांकि अभी इस परियोजना पर केवल सहमति ही बनी है, फिर भी अमेरिकी राष्ट्रपति का यह कहना महत्वपूर्ण है कि यह परियोजना केवल पटरियां बिछाने को लेकर नहीं है। यह गेमचेंजर साबित होगी। यह बंदरगाहों और रेल मार्ग के जरिये भारत को ही नहीं, वरन दक्षिण-पूर्व एशिया को भी पश्चिमी एशिया के अरब देशों और यूरोप से जोड़ेगी। भारत इसे आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ बनाने वाले स्वच्छ ऊर्जा गलियारे के रूप में भी देखता है। पाकिस्तान के वीटो से बचने के लिए फिलहाल अरब प्रायद्वीप में एक तेज गति वाले रेल गलियारे का निर्माण होगा, जिसके दोनों छोरों पर भारत और यूरोप के लिए जहाजी संपर्कों का विकास किया जाएगा। परियोजना में अमेरिका (America), भारत (Bharat), सऊदी अरब (Saudi Arabia), संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates), फ्रांस (France), जर्मनी (Germany), इटली (Italy) और यूरोपीय संघ (European Union) हैं। सऊदी अरब और इजरायल (Israel) के बीच संबंध बहाल करते हुए उसे भी शामिल किए जाने की योजना है।
 
भारत की अध्यक्षता में हुआ नई दिल्ली जी-20 (G-20) शिखर सम्मेलन संतुलित विकास को लेकर अतीत में हुए संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न शिखर सम्मेलनों की लंबी श्रृंखला में एक अहम कड़ी जैसा रहा। जून के अंत में र में पृथ्वी सम्मेलन हुआ था, जिसमें जी-20 सम्मेलन से एक ऐसे विश्व के निर्माण की आशा रखी गई थी, जिसमें गरीबी न रहे, पृथ्वी का संतुलन बहाल हो और कमजोर देशों के पास भी जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले संकटों का सामना करने की सामर्थ्य हो । लगभग यही आशा नैरोबी में हुए अफ्रीका शिखर सम्मेलन में दोहराई गई।
 
भारत ने नई दिल्ली (New Dehli) के जी-20 शिखर सम्मेलन में खेमों में बंटी दुनिया को एक साझा घोषणा पत्र के लिए राजी करते हुए उत्तर और दक्षिण के बीच बने असंतुलन को दूर करने, नए गलियारे बनाकर आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ बनाने, ऋण संकट समाधान के लिए विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाओं को वित्तपोषित करने और जलवायु संकट से निपटने के लिए विश्व जैव-ईंधन अलायंस बनाने जैसी दर्जनों पहल कीं, जो दो सप्ताह बाद होने वाले सतत विकास लक्ष्य शिखर सम्मेलन और अगले साल होने वाले विकास-वित्त सम्मेलन को दिशा और गति देने में सहायक सिद्ध होंगी। एक धरती, एक परिवार और एक भविष्य के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए भारत ने भूराजनीतिक और आर्थिक खेमों में बंटी दुनिया को एक कुटुंब के रूप में जोड़ने का प्रयास करते हुए ऐतिहासिक सफलता हासिल की है ।