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दो तिहाई भारतीय आधुनिक ईंधन से महरूम

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वाशिंगटन। देश के आर्थिक विकास का बढ़चढ़कर बखान करने वालों को ये आंकड़े मुंह चिढ़ाएंगे। यकीन नहीं होगा कि दुनिया जिस देश के चिराग को लेकर जगमगाने का ख्वाब संजोए बैठी है, उसी के तले घुप्प अंधेरा है।
भारत में 83 करोड़ 60 लाख यानी दो तिहाई आबादी आज भी ऊर्जा के लिए लकड़ी, गोबर या चारकोल जैसे परंपरागत ईंधन पर निर्भर है। वल्र्डवॉच इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।


रिपोर्ट का यह भी दावा है कि वर्ष 2035 तक दुनिया में ऊर्जा की जितनी खपत होगी, उसमें से आधे का इस्तेमाल भारत और चीन करेंगे। अमेरिका के इस इंस्टीट्यूट ने यह नया शोध ऑनलाइन प्रकाशित किया है। यह शोध ऐसे समय में आया है, जब आर्थिक संकट के भंवर में फंसी दुनिया खासकर यूरोप, तेजी से उभर रहे चीन और भारत पर सवारी गांठकर इससे बच निकलने की फिराक में है। इसके मुताबिक, दुनिया में सबसे ज्यादा जैव ईंधन पर निर्भर आबादी विकासशील एशिया में है। यहां 54 प्रतिशत आबादी परंपरागत जैव ईंधन पर निर्भर है। पिछले दो दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर घर तक बिजली पहुंचाने का जबरदस्त प्रयास हुआ है। इसके अलावा गैस व पेट्रोलियम ईंधन यहां तक कि सौर ऊर्जा का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। इसके बावजूद इतनी बड़ी आबादी बिजली व आधुनिक ईंधन से दूर है।
रिपोर्ट की मानें तो सरकारों और विकास से जुड़े संगठनों को स्वास्थ्य, पर्यावरण व रोजगार के क्षेत्र में बेहतर नतीजों के लिए विद्युतीकरण में निवेश जारी रखना होगा। वर्ष 1990 से 2008 के दौरान दुनिया भर में दो अरब लोगों को बिजली मिली है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि अब भी दुनिया में 1.3 अरब लोगों के पास बिजली नहीं पहुंची है। इसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी की है।

और क्या है रिपोर्ट में

  • खाना पकाने को तीन अरब आबादी के पास आधुनिक ईंधन नहीं।
  • पारंपरिक र्ईंधन के इस्तेमाल से हर साल होती हैं 20 लाख अकाल मौतें।
  • इससे प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिंग, वनों की कटाई जैसे पर्यावरण संबंधी खतरे

 

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