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ज्योतिष

वाराणसी में धूमधाम से मनता है डाला छठ

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सूर्योपासना के पर्व डाला छठ पर धार्मिक नगरी वाराणसी मिनी बिहार बन जाती है. और उसकी छठा देखते ही बनती है. वैसे तो यह पर्व बिहार में श्रद्धा एवं धूमधाम के साथ मनाया जाता है लेकिन बिहार की सीमा से सटा होने के कारण बिहार से यहां आकर बसे लोग वाराणसी में ही धूमधाम से डाला छठ मनाते हैं.

अब तो डाला छठ पर्व ने यहां बड़ा रूप ले लिया है. यहां के वाशिन्दे भी इसे मनाने लगे हैं.वाराणसी में दुर्गापूजा व गणोशोत्सव उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है जैसे पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में.

यहां पर बड़ी संख्या में बिहार के लोग रहते हैं और ऐसे लोगों की संख्या करीब तीन लाख है.आज अस्त होते सूर्य को अर्ध्य दिया जाएगा जबकि कल उगते सूर्य को अर्ध्य के बाद व्रत का पारण होगा.

कल महालक्ष्मी की पूजा कब करेंगे? जानिए

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इस महालक्ष्मी वर्ष में दीपावली का पावन पर्व बुधवार 26 अक्टूबर को चित्रा/स्वाति नक्षत्र और विष्कुम्भक योग से सम्पन्न है। इस दिन सभी श्रद्धालु गृहस्थजन और व्यापारी समाज को महालक्ष्मी पर्व के विशेष अवसर पर अपनी आर्थिक सफलता के लिए लक्ष्मी, कुबेर और श्रीगणेश जी का पूजन प्रदोषकाल में श्रद्धापूर्वक करना चाहिए।

कब करें पूजा: प्रदोष काल यानी स्थिर लग्न में शाम 6 बजकर 44 मिनट से 8 बजकर रहेगा। आमतौर पर गृहस्थजन और सामान्य वर्ग के लोग इसी लग्न के दौरान लक्ष्मी पूजा करते हैं। लक्ष्मी की कृपा के लिए श्री यंत्र लक्ष्मी गणेश यंत्र कुबेर यंत्र और धनदा यंत्रों की स्थापना भी महालक्ष्मीपर्व के दौरान रात में की जाएगी। दिन के समय महालक्ष्मी पूजन के लिए वृश्चिक लग्न, मकर लग्न, कुंभ लग्न, मीन लग्न और मेष लग्न उपयोगी माने गए हैं। रात्रिकाल के दौरान प्रदोषकाल में वृष लग्न, कर्क लग्न तथा महानिशीथ काल में सिंह लग्न उपयोगी माना गया है।

शरद पूर्णिमा पर करें शिव की आराधना

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शरद ऋतु में पड़ने वाली पूर्णमासी को कोजागिरी पूर्णिमा या शरद पूर्णिमा कहते हैं। पुराणों में मान्यता है कि इस दिन केसरयुक्त दूध या खीर चांदनी रोशनी में रखने से उसमें अमृत गिर जाता है।
प्राचीन काल से शरद पूर्णिमा को बेहद महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। शरद पूर्णिमा से हेमंत ऋतु की शुरुआत होती है। शरद पूर्णिमा पर चांद अपनी पूर्ण कलाएं लिए होता है।

ज्योतिषाचार्य पं. हिंगे के अनुसार इस दिन चंद्र भगवान तथा शंकर भोलेनाथ की पूजा व मंत्र जाप सायंकाल के समय करके केसरयुक्त दूध या खीर का भोग रात को लगाते हैं। भोलेनाथ के मंत्र में वह शक्ति है जिसके प्रभाव से देवता खिंचे चले आते हैं। मंत्र की शक्ति से ही सामान्य वनस्पति में भी औषधिय गुण आ जाते हैं। तथा वह मनुष्य की दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों बाधाओं को दूर कर सुख-शांति का जीवन प्रदान करती है।

पूरी श्रद्धा से करें घट स्थापन,नवरात्र पूजन

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घट स्थापना का सर्वश्रेष्ठ समय सुबह 6.22 से 7.50 तक,सूर्योदय से सुबह 9.20 बजे तक लाभ,अमृत के चौघç़डए में और सुबह 10.49 से दोपहर 12 बजे तक। >>> नवरात्र शब्द में नव संख्यावाचक होने से नवरात्र के दिनों की संख्या नौ तक ही सीमित होनी चाहिए लेकिन ऎसा नहीं हैं। कुछ देवताओं के 7 दिनों के तो कुछ देवताओं के 9 या 13 दिनों के नवरात्र हो सकते हैं।
सामान्यत: कुलदेवता और इष्टदेवता का नवरात्र संपन्न करने का कुलाचार है। किसी देवता का अवतार तब होता है जब उसके लिए कोई निमित होता है। यदि कोई दैत्य अन्य आपति आती है तो संकट में फंस जाते हैं। अथवा इसी प्रकार की कोई अन्य आपति आती हैं,तो संकट की कालवधि 7 दिनों से लेकर 13 दिनों तक रहती है। ऎसी कालावधि में उस देवता की मूर्ति या प्रतिमा का टांक चांदी के पत्र या नागवेली के पते पर रखकर नवरात्र बैठाए जाते हैं। उस समय स्थापित देवता की षोडशोपचार पूजा की जाती है।